चलो फिर से मनाते हैं वो बचपन वाली दीवाली

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Diwali 2017
बचपन वाली दीवाली

दीवाली त्यौहार ही ऐसा है जिसके आने के कुछ ही महीने पहले से मन में एक उत्साह सा छा जाता है और हर तरफ एक रोशनी और जगमगाहट नजर आती है। लेकिन अगर बात करें की बचपन वाली दीवाली की तो वह दीवाली आज की दीवाली से एकदम अलग थी, तब बंधाइयों का सिलसिला फोन या मैसेज से नहीं एक दूसरे के घर जाकर दिल से दिया जाता है। तब यह आजकल जैसी रौनक तो नहीं थी लेकिन एक अलग ही तरह की रौनक थी उस वक्त।

कैसे थी वह बचपन वाली दीवाली, तब हफ्तों पहले ही साफ-सफाई में हम खुद ही लग जाते थे, घर के सारे सदस्यों को अलग-अलग कोना बांट दिया जाता था, सब सफाई में यू लग जाते थे कि मानों पूरा उन्हीं के जिम्में है नये अखबारें अलमारियों में बिछ जाते थे। घर के पुरुष चूने के कनिस्तर में चूने के कनिस्तर में थोड़ी नील मिलाते थे, और खुद ही घर की पुताई में लग जाते थे। और महिलायें तरह-तरह के पकवान बनाने में जिसकी एक अलग ही खुशबू सब जगह छा जाती थी।अलमारी खिसका खोयी चीज़ वापस पाते थे।

 किसी ने खूब ही कही है नीचे दी हुई कुछ पंक्तियां 

दोछत्ती का कबाड़ बेच कुछ पैसे कमाते थे, ऐसे ही दीवाली में हम अपनी पाकेट मनी बनाते थे, दौड़-भाग के घर का हर सामान लाते थे, चवन्नी -अठन्नी पटाखों के लिए बचाते थे। सजी बाज़ार की रौनक देखने जाते थे सिर्फ दाम पूछने के लिए चीजों को उठाते थे।

Diwali
दीवाली बचपन वाली

तब खुद ही बिजली की झालर छत से लटकाते थे कुछ में मास्टर बल्ब भी लगाते थे, टेस्टर लिए पूरे इलेक्ट्रीशियन बन जाते थे। दूर थोक की दुकान से पटाखे लाते थे, मुर्गा ब्रांड हर पैकेट में खोजते जाते थे दो दिन तक उन्हें छत की धूप में सुखाते थे।

बार-बार बस गिनते जाते थे, मिट्टी के चक्की चूल्हा लाते थे, उस पर खाना बनाते थे उस समय चुटपुटाइया से सबके नाक में दम करते थे, कभी घरौंदें बनाकर उसे सजाते थे। फिर लक्ष्मी गणेश का पूजन करते थे, जब तक पूजा ना हो जाये पटाखे नहीं जलाते थे।

फिर इंतजार रहता था खाने का उस दिन मां के हाथ की पूरी-कचौडी भर पेट खाते थे, और मिठाई खाने के लिये डिब्बे पर नजरे टिकायें रहते थे, बचपन में जब दिवाली घर पे मनाते थे धनतेरस के दिन कटोर दान लाते थे, छत के जंगले से कंडील लटकाते थे मिठाई के ऊपर लगे काजू-बादाम खाते थे, प्रसाद की थाली पड़ोस में देने जाते थे, माँ से खील में से धान बिनवाते थे, खांड के खिलोने के साथ उसे जमके खाते थे।अन्नकूट के लिए सब्जियों का ढेर लगाते थे, भैया-दूज के दिन भाई और दीदी से आशीर्वाद पाते थे।

दीवाली बीत जाने पे दुखी हो जाते थे, कुछ न फूटे पटाखों का बारूद जलाते थे। घर की छत पे दगे हुए राकेट पाते थे, बुझे दीयों को मुंडेर से हटाते थे जब दीवाली घर पर मनाते थे यह उन दिनों के दीवाली है जब हम कभी दीवाली ऐसे मनाते थे कि भैयादूज के बाद से ही अगली दीवाली का इंतजार करने लगते थे। लेकिन आजकल की दीवाली से तो यह रौनक ही चली गयी है सब कुछ बदल गया है पहले जैसे वह बात ही नहीं रही है। लेकिन क्यों ना इस दीवाली अपनों के साथ फिर से वहीं सूनापन खत्म करते हैं।

वही पुरानी रौनक फिर से लाते हैं सामान से नहीं ,समय देकर सम्मान जताते है
उनके पुराने सुने किस्से फिर से सुनने जाते है
चलो इस दफ़े दीवाली घर पर मनाते हैं

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ