उम्मीदों और आधुनिकता के बोझ तले बर्बाद होता बचपन

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CHILDREN TODAY ARE FACING DEPRESSION
आज की भागदौड़ और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में नन्हे बच्चों का वो बेखोफ़ बचपन कहीं खो गया है।

काॅम्पटीशन के दौर में हर पेरेंट्स बच्चों से ढ़ेरों उम्मीद लगाए बैठे हैं। बच्चों की रुचि जाने बगैर ही उन पर अफ़सर, डाॅक्टर या इंजिनियर बनने की चाहत पाल बैठे है। माता-पिता की उम्मीदों और अपने ख्वाहिशों के बीच दबकर अकसर बच्चा खुद को अकेला महसूस करता है और उम्मीदों के तले दबकर अक्सर ज़िन्दगी हार जाती है जो उम्र भर का दर्द दे जाता है। हाल ही में ऐसे कई मामले देखने को मिले है जहाँ कभी बच्चा तो कभी माता- पिता खुद्खुशी कर लेते हैं।
इस बात पर समझना चाहिए कि बच्चे की रुचि जिस विषय में है उसी विषय में उसे भेजना चाहिए और अपनी उम्मीदों के चलते बच्चों की ख्वाहिशें नहीं दबानी चाहिए क्योंकि इस दौड़ में बेशक कोई जीते न जीते पर ज़िन्दगी ज़रूर हार जाती है।

बचपन एक ऐसा सुनहरा समय होता है जब बिना किसी तनाव के ज़िन्दगी बिताई जाती है और बचपन की हर याद कोहिनूर होती है। लेकिन आज की भागदौड़ और प्रतिस्पर्धा की दौड़ में नन्हे बच्चों का वो बेखोफ़ बचपन कहीं खो गया है।
अब बच्चों का खेलना कूदना मानो सिमटता जा रहा है और ऐसा हो भी क्यों नहीं जब पढ़ाई में प्रतियोगिता नर्सरी से ही शुरू हो जाए। आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने हमारे बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है, आज उनपर पढ़ाई का इतना दबाव है कि वो दिन रात पहले स्कूल और फिर कोचंग की पढ़ाई में व्यस्थ रहते है।

तकनीक ने भी बच्चों का बचपन छीन लिया है-

शरारत, खेलकूद, खूब बाहर घूमते रहना न कल की फिक्र होती थी न आज की, छुपान-छुपाई, आँख- मिचौली , गिल्ली डंडा, कंचे गोली, चोर सिपाही, टीपू जैसे खेलों की जगह वीडियो गेम्स ने ले ली है। उन खेलों के बारे में आज के बच्चे ना जानकारी रखते हैं और ना रूचि मोबाइल और कंप्यूटर पर मोर्टल कॉम्बैट, सबवे सर्फ और टेंपल रन, ऑनलाइन लूडो जैसे खेलों ने इन खेलों का वजूद ही ख़त्म कर दिया है।

रियेलिटी शो भी नन्हे बच्चों को कम उम्र में डिप्रेशन का शिकार बना देते है-

अब तो रियेलिटी शो भी नन्हे बच्चों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का काम कर रहे है और जीतने का दबाव कहीं न कहीं बच्चों को कम उम्र में गंभीर और डिप्रेशन का शिकार बना देते है।
ऐसा बिल्कुल नहीे है कि पढ़ाई और प्रतियोगिता ज़रूरी नहीे है पर इसके लिए बच्चों पर दबाव डालना क्या उनके साथ नाइंसाफ़ी नहीं है? अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो बच्चों का आने वाला मासूम बचपन अंधेरे में सिमट जाएगा जिससे देश का सुनहरा भविष्य खतरे में पड़ सकता है। आज 14 नवंबर, बाल दिवस यानी कि Children Day के मौके पर हम सबको एक प्रण लेना चाहिए कि बच्चों पर बेवजह दबाव ना डाला जाए और अपने सपने उनके कंधों पर ना डाला जाए।

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