पर्यावरण जीने का आधार है, अगर वक्त रहते नही उठाए कदम तो नष्ट हो जाएगी पृथ्वी

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औद्योगिक विकास की होड़ के चलते दुनिया का औसतन तापमान सामान्य से अधिक हो गया है

हमारा पर्यावरण लगातार नष्ट होता जा रहा है और इसकी वजह केवल इंसान ही है। इंसान आरामदायक ज़िंदगी व्यापन करने के लिए पर्यावरण से छेड़ छाड़ करता है। आज बेवक्त गर्मी, सर्दी, बारिश, बाढ़, ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएँ देखी जा रही हैं।

पर्यावरण में इस असंतुलन का आखिर ज़िम्मेदार कौन है?

जा़हिर सी बात है ‘मनुष्य‘ स्वयं पर्यावरण की दुर्गति का जिम्मेदार है। जंगल, ज़मीन और जल हर तरफ़ मनुष्य का अतिक्रमण हुआ है। मनुष्य ने अपने फ़ायदे के लिए अंधाधुंद खनन, वनों की कटाई व शहरीकरण किया जिसके कारण सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को हुआ है। औद्योगिक विकास की होड़ के चलते दुनिया का औसतन तापमान सामान्य से अधिक हो गया है जिससे आने वाला समय किसी के रहने लायक नहीे रहेगा।

आईडीएसए की एक रिपोर्ट:-

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पर्यावरण नष्ट होने की वजह केवल इंसान ही है

रणनीतिक मामलों को स्टडी करने वाली संस्था आईडीएसए ने इस पर एक रिपोर्ट बनाई है। जिसमें क्लाइमेट चेंज को भारत के लिए गैर पारंपरिक खतरा बताया गया है। कई और बातें शामिल की गई हैं जैसे-

  • हर साल समुद्री स्तर में 1.06 से 2.75 मिलिमिटर बढ़ोतरी हो रही है। तामपान में हर एक डिग्री इज़ाफ़े का असर खेती पर पड़ेगा। हर एक डिग्री बढ़ोतरी में गेंहू का उत्पादन 4 से 5 मिलियन टन कम होगा।
  • हिमालय के लगभग 1500 ग्लेशियर अगले 40-50 सालों में जैसे जैसे पिघलेंगे, समुद्री स्तर बढ़ने से बाढ़ के खतरे के साथ-साथ तटीय क्षेत्रों की सीमाएं भी परिवर्तित होंगी।
  • नदियों की दिशाएँ बदल रही हैं जिसकी वजह से उनसे जुड़े समझौतों पर असर पड़ सकता है। और पानी बंटवारे को लेकर भारत-पाकिस्तान के बीच नए विवाद भी खड़े हो सकते हैं।

ज़रूरी है पर्यावरण को बचाना:-

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इंसानों को विकास की दौड़ में पर्यावरण को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए

प्रदूषण के कारण दुनिया आज कई तरह की प्राकृतिक आपदाएँ देख रही है। कहीं पर तेज़ तीव्रता का भूकंप, कहीं बाढ़, वक्त से पहले गर्मी व सर्दी सब पर्यावरण असंतुलन के कारण हो रहे हैं।

अगर ऐसा ही चलता रहा तो अगले 50 वर्षों मे धरती मे दुर्लभ क्षेत्रों के अलावा वनों का नामोनिशान मिट जाएगा । लगातार कटते जंगलों से भू रक्षण की समस्या भी बढ़ रही है इससे बरसात के पानी के साथ खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी बह रही है। इससे मिट्टी के पोषक तत्व ख़त्म हो रहे हैं और मिट्टी बंजर हो रही है।

उद्योगों के विषैले घोलों तथा गंदी नालियों के निकास ने नदियों को खराब करके रख दिया है। खराब नदियों के पानी का कई लोग और जानवर इस्तेमाल करते हैं और फिर बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। कई मामलों में तो जान तक चली जाती है।

पर्यावरण को सबको साथ मिलकर बचाना होगा:-

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हर किसी द्वारा केवल एक छोटे कदम से बिगड़ते पर्यावरण में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

दुनिया में पर्यावरण को लेकर चेतना में बढ़ोतरी तो हो रही है लेकिन असलियत में उसकी परिणति होती दिखाई नहीं दे रही है। चारों ओर पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर लीपा-पोती हो रही है।

5 जून को विश्व भर में पर्यावरण सुरक्षा और सरंक्षण हेतु विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। लेकिन पर्यावरण के लिए केवल एक दिन सीमित न करके हर किसी को हर क्षण प्रयत्न करना जरूरी है। हमारी पृथ्वी अपना अस्तित्व खोने की कगार पर पहुँच रही है। तापमान में असामान्य बढोतरी होना, समुद्र का जलस्तर में बढोतरी होना, दिन-प्रतिदिन प्रदूषण का स्तर बढना, इस बात की ओर इशारा कर रही है कि पृथ्वी और प्र्यावरण दोनोें खतरे में है। इसे बचाने के लिए हर किसी को एकजुट होकर कदम उठाना होगा। जैसे पोलिथीन का उपयोग न करना, वनरोपण को बढावा देना, बारिश का जल एकत्रित करना आदि। अपने-अपने स्तर पर प्रयास करके हम पर्यावरण को सुरक्षित और प्रदूशणमुक्त बना सकते है।

  • कचरे की मात्रा कम करना, कचरे को ठीक से उसकी जगह पर फेकना।
  • गीले और सूखे कचरे को अलग अलग फेकना।
  • प्लास्टिक की पोलिथीन का इस्तेमाल बंद करना।
  • वर्षा जल संरक्षण करना क्योंकि भू जल में भारी कमी देखी जा रही है।
  • ऊर्जा संरक्षण करना, और बिजली का कम से कम उपयोग करना।
  • जितना हो सके पब्लिक वाहनों का इस्तेमाल करें। इससे वायु प्रदूषण कम होगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण की रोकथाम के लिये सरकार सोच रही है। लेकिन अपेक्षित फ़ायदा नहीं हो पाया। ऐसा इसलिए क्योंकि हम लोगों को भी एक साथ आना होगा। हर किसी द्वारा केवल एक छोटे कदम से बिगड़ते पर्यावरण में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।

इंसानों को विकास की दौड़ में पर्यावरण को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। नही तो एक वक्त ऐसा भी आ सकता है कि विकास के नाम पर प्रकृति व पर्यावरण से हो रहे छेड़-छाड़ का खामियाज़ा मनुष्य को अपने विनाश से चुकाना पड़ेगा।

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