क्‍या देश में संवेदना और सहनशीलता बची है?

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Gauri Lankesh
पत्रकार गौरी लं‍केश

हाल ही के दिनों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई। जिसके बारे में सोचकर डर लगता है। ऐसा लगता है, जैसे देश में संवेदना और सहनशीलता बची ही नहीं है। देश के हर इंसान में नफरत है। एक दूसरे के लिए गुस्‍सा है। हर कोई अपने आप को सही साबित करना चाहता है। कौन सही है और कौन गलत है, ये कोई जानना ही नहीं चाहता। बस अपना गुस्‍सा जाहिर करना चाहता है। और बताना चाहता है, कि जो मैं कर रहा हूं वो सही है। चाहे फिर उसके लिए कानून को हाथ में क्‍यों ना लेना पड़े।

देश में एक विचारधारा के लोग दूसरी विचारधारा के लोगों पर हमला करना चाहते हैं। ये सोचकर कि हम ही सही हैं। लेकिन कौन सही है और कौन गलत, इस का फैसला नफरत और गुस्‍से से नहीं हो सकता है।

5 सिंतबर को एक पत्रकार गौरी लं‍केश अपने ऑफिस से लौट रही थी। उसी दौरन उनके घर के पास हमलावार हमला करते हैं और गोली मार कर उनकी हत्‍या कर देते हैं। कुछ लोग हत्‍या के बाद उनके लिए अपशब्‍द का इस्‍तेमाल करते हैं और खुश होते हैं। लेकिन कुछ लोग इस हत्‍या की कड़ी निंदा भी करते है।

वहीं सोशल मीडिया की जनता हर मुद्दे पर बात करती है। पूरी जानकारी हो या ना हो मगर अपनी राय पूरी रखती है। गौरी लं‍केश की हत्‍या को लोगों ने कई तरीकों से जोड़ा। कुछ लोगों ने कहा, कि गौरी लंकेश की हत्‍या, इसलिए की गई, क्‍योंकि वो सरकार के खिलाफ लिख रही थी। कुछ ने कहा, कि उनकी विचारधारा लोगों को पसन्‍द नहीं आई। लेकिन किस कानून की किताब में लिखा है, कि अगर विचारधारा आप से अलग हो, तो हत्‍या कर दो। विचारों की लड़ाई हत्‍या से नहीं विचारों से होनी चाहिए। लेकिन आज के वक्‍त में एक विचारधारा के लोग हत्‍या करके आवाज बन्‍द करना चाहते हैं। और ये बताना चाहते हैं, जैसा हम सोच रहे हैं और बोल रहे हैं, वो ही स‍ही है। वैसा ही आप करें, वरना हम आपकी हत्‍या कर देगें।

पत्रकार और एक लेखक की कलम को तोड़ने की पूरी कोशिश हो रही है। गौरी लंकेश कोई पहली पत्रकार नहीं है। जिनपर हमला हुआ है, ऐसा बहुत से पत्रकारों के साथ हुआ है। देश में कई पत्रकारों की आवाज को दबाने की पूरी कोशिश की गई है। मगर जब-जब एक आवाज दबी तो दस नई आवाज बुलंद हुई हैं।

इस हत्‍या के बाद एक सवाल ये भी उठा, कि गौरी लंकेश को सुरक्षा क्‍यों नही दी गई। लेकिन राजधानी दिल्‍ली से लेकर गुरूग्राम तक अपने बच्‍चों को स्‍कूल में पढ़ा रहे, मां-बाप सरकार से एक ही बात पूछ रहे हैं। जब बच्‍चा स्‍कूल के अन्‍दर सुरक्षित नहीं है, तो कहां होगा। क्‍या स्‍कूल हमें बच्‍चों को सुरक्षा नहीं दे सकता।

शुक्रवार सुबह न्‍यूज चैनलों पर एक दिल दहला देने वाली खबर चली। उस वक्‍त ये महसूस हुआ, कि देश में संवेदना शायद रही ही नहीं है। दरअसल, गुरूग्राम के रायन इंटरनेशनल स्‍कूल में कुल सात साल के बच्‍चे की गला रेतकर हत्‍या कर दी गई। सही वजह क्‍या है और क्‍या नहीं, ये कोई नहीं जानता। मगर पुलिस ने स्कूल बस के कंडक्‍टर को आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया। आरोपी ने कैमरे पर अपना गुनाह भी कबूल लिया। मगर बच्‍चे की मां का साफ कहना है, कि आरोपी कंडक्‍टर नहीं है। स्‍कूल इस केस को दबाने की कोशिश कर रहा है। क्‍या सच है और क्‍या झूठ ये कोई नहीं जानता है।

मगर आप कुछ पल के लिए महसूस करें, कि क्‍या बीतती होगी ऐसे मां-बाप पर जो मां सुबह अपने बच्‍चे को तैयार करके स्‍कूल भेजती है। ये सोचकर की उसका बच्‍चा बड़ा होकर कुछ करेगा। और एक बाप अपने बेटे को स्‍कूल के गेट तक खुद छोड़ने आता है। और स्‍कूल पर भरोसा करता है। सुरक्षा और पढ़ाई को देखते हुए अच्‍छे से अच्‍छे स्‍कूल में भेजता है। मगर उन्‍हीं स्‍कूल में उसका बच्‍चा सुरक्षित नहीं है। कभी हत्‍या कर दी जाती है तो कभी रेप कर दिया जाता है। जब स्‍कूल प्रशासन बच्‍चों की सुरक्षा की जिम्‍मेदारी नहीं ले सकता है, तो स्‍कूल क्‍यों चल रहा है। क्‍यों सरकार कुछ नहीं करती ऐसे हमले में। क्‍या मां-बाप अपने बच्‍चों को स्‍कूल भेजना बंद कर दें।

ऐसे ही कई ख़बरें आए दिन सुनने को मिलती रहती हैं। जो हमें सोचने के लिए मजबूर करती हैं। हमें ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए आवाज बुलंद करनी होगी। और अगर आप ये सोचकर खुश हो रहे हैं, कि मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं क्‍यों कुछ बोलूं। तो शायद अगला नम्‍बर आप का ही हो।

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