रोहिंग्या:- राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती?

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ROHINGA ISSUE
रोहिंग्या मुद्दा

भारतीय विदेश नीति के सामने तब एक बड़ा प्रश्न खड़ा उठ हुआ जब मुद्दा रोहिंग्या मुसलमानों का हमारे सामने आया। अब हमें फैसला लेना है कि उनको मानवता का परिचय देते हुए शरण दे या अपने अतीत से प्रेरणा लेते हुए देश की संप्रभुता के बारे में सोचें। प्रश्न यह भी है कि,1971 के बांग्लादेश के विभाजन से हमे सबक लेना है या आज के हिसाब से स्थिति को संभालना है।

म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है। म्यांमार में एक अनुमान के मुताबिक़ 10 लाख रोहिंग्या मुसलमान हैं। इन मुसलमानों के बारे में कहा जाता है कि वे मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। सरकार ने इन्हें नागरिकता देने से इनकार कर दिया है। हालांकि ये म्यामांर में पीढ़ियों से रह रहे हैं। रखाइन स्टेट में 2012 से सांप्रदायिक हिंसा जारी है| इस हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जानें गई हैं और एक लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए हैं।

बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमान आज भी जर्जर कैंपो में रह रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों को व्यापक पैमाने पर भेदभाव और दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है| लाखों की संख्या में बिना दस्तावेज़ वाले रोहिंग्या बांग्लादेश में रह रहे हैं। इन्होंने दशकों पहले म्यांमार छोड़ दिया था।

“सू की” दुनिया भर में मानवाधिकारों की रक्षा करने वाली मानी जाती है और इसके बावजूद खुद उनके ही घर में वहां के एक समुदाय को न तो सामाजिक सुरक्षा दी जा रही है न ही आर्थिक और राजनैतिक यह इस इस बात का सबूत है की कब एक मानव एक ही समय में नैतिकता का चोला ओढ़ता है और ऊंचाई प्राप्त करने के बाद वो अनैतिक तत्वों के प्रति असंवेदनशील हो जाता है। आज रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों पर किये जा रहे ज़ुल्मों में सबसे ज़्यादा पीड़ित हैं, म्यांमार की अधिकतर आबादी बौद्ध होने क साथ वहां लगभग 10 लाख मुस्लिम रहते हैं जिन्हे अवैध बांग्लादेशी मानकर उनके साथ वैसा ही सलूक किया जा रहा है जैसा असभ्य लोगों द्वारा अपनी झूटी शान, मर्यादा, परम्परा के लिए किसी अन्य समुदायों के साथ किया जाता हैं जैसे गौ रक्षा के नाम पर, ज़ुबान के नाम पर, जाति के नाम पर, सम्मान के नाम पर अन्य समुदायों को प्रताड़ित करना।

म्यांमार के रखाइन राज्य में 5 साल से सांप्रदायिक दंगे हो रहे है जहाँ इन मुसलमानो पर लम्बे समय से बौद्धों द्वारा, भेदभाव, दुर्वयवहार किया जा रहा है जो स्वंय में एक ऐसे धर्म से आते है जो सबसे शांतिप्रिय, प्रेम सदभाव, त्याग और दूसरों यहाँ तक की जानवरों से भी प्रेम करने की बात सीखाता है यहाँ समस्या किसी धर्म की नहीं होती बल्कि यहाँ सालों से चल रहे कट्टरपंथी प्रचार अभियान के कारण है|जिसका शिकार सभी अल्पसंखयकों को होना पड़ता है यही कारण है की बड़ी संख्या में मुस्लिम विस्थापित हुए और शरण लेने के लिए बंगलादेश जा पहुंचे या फिर जर्जर कैम्पो में रहने को मजबूर हो गये हैं।

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रोहिंग्या:- राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती है क्या ?

यह अपनेआप में 25 साल बाद आयी डेमोक्रेसी सरकार पर एक धब्बे जैसा है जहाँ लोकतंत्र का खुला अपमान हो रहा है। यह एक ऐसी सरकार है जहाँ नोबल विजेता “सू की” ने बस मौन धारण कर तमाशा देख रही हैं और वहां की आर्मी खुले रूप में लोगों को प्रताड़ित, हताहत, बलात्कार जैसे रोज़ मर्रा की मुसीबतों का सामना करने के लिए उन्हें मजबूर कर रही जिससे उन्हें मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से भी पंगु बनाया जा सके और अफ़सोस की बात ये है कि म्यांमारी जनता भी अपनी सहानुभूति को सूली चढ़ाकर, मानव धर्म जैसे तत्वों का गला घोटकर इन सब निर्मम कृत्यों में सेनाओं के समर्थन कर रही है।

वहीं बंगलादेश सरकार भी इन शरणार्थियों को किसी भी रूप में सुरक्षा देने को मंशा को ज़ाहिर नहीं कर रहा है और उन्हें म्यांमार की तरफ वापस खदेड़ने की योजना पर ज़ोर देता आ रहा है। अत: दक्षिण-पूर्व एशिया का बड़ा भाई होने के कारण भारत का ये उत्तरदायित्व हैं की वो अपने कंधे पर इनका दायित्व ले जिससे कि उसके पडोसी देश में नस्ली सफाये जैसी अमानवीय गन्दी हरकत अपने पैर न पसार सके। ऐसे माहौल में दखल देना भारत के लिए आसान नहीं है परन्तु वह दुनिया भर के लोकतान्त्रिक देशों, संगठनों, और जनता के समर्थन के साथ अपना विरोध ज़ाहिर कर सकता है और वैश्विक स्तर म्यांमार व भूटान पर दबाव बनाये जिससे अपने ही देश के लोगों के साथ वे ऐसा बर्ताव न कर सके।

इस मुद्दे पर केन्द्र ने उच्चतम न्यायालय से कहा कि, संविधान में प्रदत मौलिक अधिकारों के हनन के मामले में रिट अधिकार का प्रयोग सिर्फ देश के नागरिकों को उपलब्ध है, अवैध आव्रजकों को नहीं। केन्द्र ने रोहिंग्या शरणार्थियों और उनके यहां निवास को अवैध बताया और कहा कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा पैदा करते हैं। इस मामले पर केंद्रीय गृह मंत्री किरण रिजिजू ने सोमवार को कहा कि सरकार का रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार निर्वासित करने का फैसला देश हित में था। रिजिजू ने रोहिंग्या शरणार्थियों पर सर्वोच्च अदालत की सुनवाई से पहले संवाददाताओं को बताया, “यह बहुत ही संवेदनशील मामला है। सरकार जो भी करेगी, वह देश हित में होगा।”

आप को बता दे कि भारत की कोई शरणार्थी नीति नही है, जिसके चलते केंद्र और भारत की मुसीबते और बड़ रही है।

सर्वोच्च न्यायालय रोहिंग्या शरणार्थियों को म्यांमार भेजने के सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है। रिजिजू ने कहा कि सरकार का कदम देश हित पर आधारित होगा। उन्होंने कहा, “हम सर्वोच्च न्यायालय में दायर होने वाले हलफनामे में भी इसी का उल्लेख करेंगे।” उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से भारत का दुष्प्रचार नहीं करने का आग्रह करते हुए कहा, “भारत एक संप्रभु राष्ट्र है और देश की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है।” जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने बीते सप्ताह रोहिंग्या संकट को लेकर भारत के रुख की आलोचना की थी।

 

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