बधाई हो आज हिंदी दिवस है

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hindi diwa
आज हिंदी दिवस है..

14 सिंतबर को पूरे देश में हिन्दी दिवस मनाया जाता है, हिन्दी दिवस को लेकर विभिन्न संस्थाओं में कई कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, और आज हम सभी हिंदी दिवस मना रहे है, खास बात यह है कि आज स्कूलों में उस भाषा के बारे में बताया जाता है, जो हमारी मातृभाषा है, जो हमारी पहचान है, शायद हम कही अपनी पहचान ही भूल गये हैं, शायद हमे पता ही नही है की हमारी पहचान क्या है? हम तो बस अपने आप को सामाजिक रूप से उन्नत होने के प्रयास में हैं| आश्चर्य की बात ही है की हमारी उन्नति हमारी अपनी ही भाषा में नहीं है उन्नत बनने के लिए हमे कोई ओर भाषा का सहारा लेना होगा, विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश को आगे बढ़नें किसी और देश की भाषा का प्रयोग करना होगा। क्योकि आज किसी व्यक्ति को मातृभाषा के शब्द ही समझ नहीं आते, उन्हें समझ आता है तो बस “व्हाट इज दिस”?

भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में न्याय सर्वोच्च है, फिर भी यह न्याय लोगो तक अंग्रेजी भाषा में पहुंचता है, इसका मतलब यह है की यहां का आम नागरिक तब तक न्याय को समझ नहीं सकता जब तक की उसे उसका वकील उसकी भाषा में ना समझाए।

कहीं न कहीं हम भूल रहे है की महात्मा गांधी तभी हमारे देश को स्वतंत्र करवा पाए थे, जब उन्होंने हिंदी भाषा की डोर में पूरे देश को एक सूत्र में पिरोया था, एक गुजराती होने के नाते उन्हें इस बात का एहसास था की जब तक हम एक नही होगे तब तक हम अपनी पहचान को नहीं पा सकते। गांधी न ही केवल नेता थे, बल्कि एक मुखर पत्रकार भी थे, उन्हें हिंदी, गुजराती और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान था| भारतीय समाज को जागरूक करने के लिए उन्होंने दो हिंदी अखबार भी निकाले- नवजीवन और हरिजन सेवक। लेखको के पिता कहे जाने वाले प्रेमचंद का भी कहना था की “उनका हिन्दी और राष्ट्रीय आन्दोलन से जुड़ना गांधी जी के कारण ही संभव ही हो सका”। गांधी जी का कहा हुआ यह वाक्य बहुत प्रसिद्ध है की “राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की उन्नति के लिए आवश्यक है।” गांधी जी जो भी लिखते थे उसे हिंदी नही बल्कि हिन्दुस्तानी कहते थे।

14 सितम्बर को संविधान के अनुछेद 343 में हिंदी को राजकीय भाषा का दर्जा प्राप्त हुआ था, तभी से हिंदी दिवस का आयोजन शुरू हुआ, उस समय जब संविधान सभा हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा प्रदान करने के मुद्दे पर विचार कर रही थी तब दक्षिण भारत की ओर से काफी विरोध का सामना करना पड़ रहा था, 15 वर्षो के बाद जब संसद में हिंदी को अपनाने का विधेयक रखा गया तो फिर दक्षिण भारत की ओर से विरोध प्रदर्शन हुआ, पर इस बार हिंदी की कमान संभाली डॉ राम मनोहर लोहिया ने जिन्होंने “अंग्रेजी हटाओ” का नारा दिया था, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भी हुए, BHU में ही कई छात्रों ने नारा दिया “अंग्रेज़ी में ना काम होगा, फिर से देश न गुलाम होगा”, पर अचानक लोहिया की मृत्यु ने राष्ट्रीय पहचान का आन्दोलन समाप्त हो गया, इस वर्ष 2017 में इसी आन्दोलन की 50वी सालगिरह है,पर दक्षिण भारतीयों को ऐसा लग रहा था की उन पर हिंदी थोपी जा रही है, शायद यही कारण है की आज हम भाषाओं के आधार पर बटें हुए है तथा अपने आप को श्रेष्ठ साबित करने में जुटे हुए हैं।

परन्तु कहीं ना कहीं हम भूल जाते है की क्षेत्रीय पहचान से ज्यादा जरूरी है राष्ट्रीय पहचान, आपको को बता दे की अमेरिका  जैसे विकसित देश में जहां अंग्रेजी बहुभाषी ही है वहा अब तक अंग्रेजी को राजकीय भाषा नहीं बनाया गया है, अमेरिका के 22 राज्यों की राजकीय भाषा अंग्रेजी नहीं है, पर हम है की अंग्रेज़ ही बनाना चाहते है, अपनी मौलिक पहचान को छोड़कर उनको अपनाने में जुटे हुए है, जिहोने हमे 150 साल गुलाम बनाये रखा, ख़ास बात यह भी है की अंग्रेज़ बनाना सामाजिक छवि को भी “हाई क्लास” बनाता, यही आज हम अपने बच्चो को भी दे रहे है, आज का दिन इसी कार्य के लिए ऑफिशियल रूप से नियत भी किया गया है।

कुछ बाते हिंदी के क्रमिक विकास के बारे में…

  • संस्कृत से उपजी भारतीय आर्य भाषाओ के जरिये हिंदी का विकास 1050 से 1150 के मध्य हुआ।
  • 1192 में दरबारी कवि चंदवरदाई ने हिंदी साहित्य के पहली रचना “पृथ्वीराज रासो” की रचना की
  • पहला हिंदी उपन्यास “परीछा गुरु” हुआ जिसे श्रीनिवासदास ने लिखा था।
  • भारत का पहला हिंदी अखबार “उदन्त मार्तण्ड” था जो 1826 में प्रकाशित हुआ था।
  • हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार सबसे पहले गुजराती कवि श्री नर्मद ने 1833 में रखा।
  • साल 1930 में पहला हिंदी टाइपराइटर भारत में आया।
  • 1931 में पहली हिंदी फिल्म “आलम आऱा” भारतीय सिनेमा में रिलीज़ हुई।
  • 1952 में पहली बार संसद में हिंदी संबोधन सांसद एन.एल शर्मा ने किया।
  • पहला विश्व हिंदी सम्मलेन 10-12 जनवरी 1975 को किया गया, जिसमे 30 से अधिक देशो ने भाग लिया।
  • संयुक्त राष्ट्र में पहली बार हिंदी में भाषण अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 में दिया था।
  • इलाहबाद के न्यायधीश रहे स्व. प्रेम शंकर गुप्त ने अपना निर्णय पहली बार हिंदी में दिया।
  • अपना पहला हिंदी ब्लॉग “नौ दो ग्यारह” आलोक कुमार ने 2003 में लिखा।
  • देश का पहला राष्ट्रीय हिंदी संग्राहलय आगरा में स्थापित करने की योजना है।

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