हाँ, मैं एक औरत हूँ, आख़िर क्यों यह समाज मुझे बेड़ियों में देखना चाहता है?

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today's woman
आज की औरत वो है जो बहु बनकर अपना घर चलाना भी जानती है और बाहर जा कर काम करना भी जानती है।

दुनिया कहती है कि औरत महान है, देवी का रूप है और सबसे पवित्र है। पर क्या सच में यह समाज एक औरत का सम्मान करता है? औरत माँ , बेटी, पत्नी होती है, फिर क्यों यह समाज उसे गुमनामी में रखने की कोशिश करता है? क्या औरत की अपनी कोई पहचान नहीं है? या यह समाज उसे अपनी पहचान बनाने नहीं देता है?

मेरा व्यवहार नहीं, कपड़े तय करते हैं किरदार:-

मैं वही औरत हूँ जिसके कपड़ों से तुम उसके किरदार का फ़ैसला करते हो।  मैं अगर सच बोलूँ तो दुनिया बुरा मान जाती है। मुझे डर भूतों से नहीं लगता है बल्कि डर मुझे इस समाज से लगता है, जिनकी नज़रें मुझे काटने को दौड़ती है। जिनकी नज़रे मुझे जींस पहनने पर ऐसे घूरती है की मानो कोई अपराध किया हो मैने। पर ये लोग ऐसा क्यों करते हैं? ओह शायद मैं एक औरत हूँ ना।

इसे समाज का दोगलापन कहूँ या कुछ और कहूँ कि जीन्स टॉप में अगर 2 इंच पेट दिख जाए तो ये समाज कहता है “लड़की बदचलन है”, पर यही समाज साड़ी और ब्लाउस में 6 इंच पेट दिखने पर अपना मुँह बंद रखता है। यह कैसी संस्कृति है?

कोई कुछ भी कहे तो जवाब मत दो:-

मेरे मुँह से कभी कोई आवाज़ नही निकलनी चाहिए। चाहे स्कूल, ऑफ़िस या बाज़ार जाते वक्त कोई मुझे छेड़े, सीटियाँ बजाए, गंदी बाते कहे, मुझे कोई बग़ावत नहीं करनी चाहिए। बस सिर नीचे करके चुप चाप निकल जाना चाहिए। क्योंकि में एक औरत हूँ, है ना?

देर घर पहुँचू तो मैं लापरवाह और बिगड़ी हुई हूँ:-

मैं अगर स्कूल या कॉलेज से एक घंटा भी देर घर पहुँचू तो मैं लापरवाह और बिगड़ी हुई हूँ। पर अगर मेरा भाई घर देर से पहुँचे तो कोई बात नहीं। आख़िर वो एक लड़का है, घूमेग- फ़िरेगा नहीं तो और क्या करेगा?

कॉलेज के बाद मैं अगर आगे पढ़ने की बात करूँ तो घर वालों से पहले समाज कहता है कि “अब आगे पढ़ कर क्या करेगी? जाना तो ससुराल ही है।” पर मैं ससुराल जाने के लिए नहीं बल्कि खुद के पैरों पर खड़े होने के लिए पढ़ना चाहती हूँ। मैं आगे बढ़ना चाहती हूँ, दुनिया से कंधे मिला कर चलना चाहती हूँ। पर मेरे लए तो ये सोचना भी पाप है, है ना? क्योंकि मैं एक औरत हूँ।

शादी के बाद नौकरी यानी पति के आत्मसम्मान को ठेस:-

जब एक लड़की शादी करती है तो उसके अंदर एक अरमान होता है कि शायद उसके ससुराल वाले उसके फ़ैसलों की इज़्ज़त करेंगे।
शादी के बाद जब वो नौकरी करने की बात करती है तो एक रूखा सा जवाब उसको मिलता है ” अरे क्या करोगी नौकरी करके? पति कमाता तो है इतना अच्छा, किसी चीज़ की कमी हो तो वो पूरी कर देगा।”
कोई यह क्यों नहीं समझता कि नौकरी का मतलब सिर्फ़ ज़रूरत पूरी करना नहीं होता। नौकरी करने का मतलब आज़ाद महसूस करना होता है, खुले आसमान में आज़ाद पंछी की तरह जीना होता है। किसी को यह क्यों नही नज़र आता? क्योंकि शायद मैं एक औरत हूँ।

औरत हूँ, कमज़ोर नहीं:-

ध्यान रहे जिस औरत का तुम आज मज़ाक उड़ा रहे हो, तुमने जन्म भी एक औरत के गर्भ से लिया है। उसके बिना तुम्हारा वजूद ही क्या है। कब तक रोक पाओगे औरतों को आगे बढ़ने से? कब तक रख पाओगे चार दीवारी के अंदर? औरत चाहे तो सब कुछ कर सकती है क्योंकि औरत ही माँ बनकर घर की रक्षा करती हैं और एक घर को संपन्न्न सिर्फ़ एक औरत ही बनाती है।

आज की औरत ” एक सशक्त औरत”:-

आज की औरत वो है जो बहु बनकर अपना घर चलाना भी जानती है और बाहर जा कर काम करना भी जानती है।

गया वो ज़माना जब एक औरत दब कर रहने को मजबूर थी। आज पढ़ाई हो, जॉब्स हो, खेल हो, घर चलाना हो, हर क्षेत्र में एक नारी आगे बढ़ रही है और बढ़ती रहेगी। यहाँ तक कि आज देश की सुरक्षा की कमान भी औरत के हाथ में है।

औरत वो है जो समय आने पर ‘देवी’ तक का अवतार बन जाती है। औरत वो है जो ‘दुष्टो’ का संहार करने के लिए ‘दानवी’ काली  का भी रूप ले सकती है। याद रखना औरत वो है जो वक्त आने पर यमराज तक से अपने पति के प्राण वापस ला सकती है। इसलिए कभी भी मत करना उसे कमज़ोर समझने की भूल।

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