क्या ई- अस्पतालों का लाभ लोगों तक पहुँच रहा है?

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e-hospitals
ई-अस्पताल

क्या है ई- अस्पताल

ऑनलाइन पंजीकरण प्रणाली आधार नंबर पर आधारित देश के विभिन्न अस्पतालों को जोड़ने के लिए एक प्रयास है जो डॉक्टर से मिलने के लिए समय की सेवा उपलब्ध कराती है।  ये सेवा वहां उपलब्ध की जा सकती है जहाँ ‘अस्पताल प्रबंधन सूचना प्रणाली (HMIS)’ द्वारा काउंटर आधारित ‘बाहरी रोगी विभाग पंजीकरण एवं अपॉइंटमेंट प्रणाली’ पहले से लागू है।  ये सेवा एन.आई.सी. की क्लाउड सेवाओं के माध्यम से उपलब्ध कराई गई है।  ये सेवा उपभोक्ता के आधार नंबर पर आधारित व्यक्तिगत जानकारी KYC का प्रयोग कर विविध अस्पतालों के विविध विभागों के साथ अपॉइंटमेंट की सुविधा उपलब्ध करवाती है।  यदि रोगी आधार के साथ पंजीकृत है तो यह रोगी के नाम का प्रयोग कर पंजीकरण करता है|अन्यथा रोगी अपने मोबाईल नंबर द्वारा पंजीकरण कर सकता है।  आधार नंबर पर पंजीकृत नए रोगियों को अपॉइंटमेंट के साथ साथ ‘एकमात्र स्वास्थ्य पहचान अंक (UHID)’ भी दिया जायेगा।  यदि आधार नंबर पहले से ही ‘एकमात्र स्वास्थ्य पहचान अंक (UHID)’ के साथ जुड़ा हुआ है तब केवल अपॉइंटमेंट नंबर दिया जायेगा और ‘एकमात्र स्वास्थ्य पहचान अंक (UHID)’ वही रहेगा।

सरल अपॉइंटमेंट प्रक्रिया

अस्पताल में आपके प्रथम पंजीकरण व डॉक्टर से अपॉइंटमेंट को अब ऑनलाइन एवं सरल बना दिया गया है। आप केवल आधार नंबर का प्रयोग कर स्वयं को सत्यापित करें, उसके बाद अस्पताल व विभाग के नाम, अपॉइंटमेंट हेतु तिथि का चयन करें और तुरंत अपॉइंटमेंट हेतु SMS प्राप्त करे।

डैशबोर्ड

कुल अस्पतालों की संख्या एवं उनके विभागों की संख्या, जिनका अपॉइंटमेंट ऑनलाइन ओ॰ आर॰ एस॰ (ORS) के माध्यम से लिया जाना है, उनकी संख्या को डैशबोर्ड में देखा जा सकता है।

अस्पताल जुड़े

जो अस्पताल, रोगियों को ऑनलाइन पंजीकरण एवं अपॉइंटमेंट सुविधा उपलब्ध कराना चाहते हैं, वे ओ॰ आर॰ एस॰ से जुड़ सकते हैं।  यह व्यवस्था अस्पतालों को अपॉइंटमेंट प्रक्रिया को आसन बनाने तथा रोगियों के आगमन को सरल बनाने मे सहायक है।

भारत के अस्पतालों के हाल

भारत सरकारों ने स्वास्थ्य के लिये कई नीतिया बनाई है लेकिन वो कारगर सिद्ध नही हुई हैं जैसे फ्री दवाइयां देना फ्री दवाइयों के नाम पर कुछ ही दवाइयां दी जाती हैं बाकी सब बहार से लेनी पड़ती हैं जो विदेशी कम्पनियों की होती हैं।  जिनमे डॉक्टरों को मोटा कमीसन मिलता है वही दवाइयां लिखी जाती हैं मरीजों को पहले डॉक्टर के घर पर दिखाना पड़ता है सरकार ने ने जो भी जांच की मशीनें  अस्पतालों में लगवाई हैं वो हमेशा सुचारू रूप से नही चलती हैं गरीबों को जांचें बहार से करवानी पड़ती हैं जिनकी रेट बहुत अधिक होती हैं जो गरीब आदमी के बस की बात नही है।

conditions of hospitals of india
भारत के अस्पतालों के हाल

गांवों में तो दूर दूर तक डिस्पेंसरी भी नही है बड़े हॉस्पिटलों में अधिक दबाब होने के कारण उनको बैड भी उपलब्ध नही होते हैं जो कि मरीज़ों में सक्रमण का खतरा अधिक होता है न तो उपयुक्त अस्पतालों में बैड की संख्या बढ़ाई जा सकी है। जिस तेजी से जनसँख्या बढ़ी है न ही हॉस्पिटलों की जिस हिसाब से जनसँख्या बढ़ी है उसी रफ्तार से हॉस्पिटलों ओर डिस्पेंसरियों की संख्या बढ़ानी होगी बराबर दवाईयों व उपकरणों की सप्लाई निरंतर बराबर देनी होगी  सरकार को नीतियों में बदलाव लाना होगा गरीब जनता का भला हो सके इसी आधार पर नीतिया बनानी होगी जिससे गरीब लोगों की बेसकीमती जिंदगी को बचाई जा सकती है।

शहरों में भी जो अस्पताल हैं वो सुबह 9 से 2 बजे और शाम को 5 से 7 खुलते हैं बड़े अस्पताल दूरी पर होते हैं रात की कोई सुविधा नही है अगर एमरजेंसी में सबको प्राइवेट अस्पतालों में ही जाना पड़ता है ये सबकी मजबूरी होती है हर बीमार का परिजन सोचता है कि बीमार को जल्द इलाज़ मिले क्योकि डॉक्टर के सिवाय कोई नही जानता है कि बीमारी क्या है इसलिये जल्दी से जल्दी इलाज की सोचता है क्योंकि सरकारी अस्पताल में नम्बर भी दिरी से आता है और जब तक डॉक्टर को घर नही दिखाया जाता डॉक्टर बाहर की जांच लिखता है प्राइवेट अस्पतालों में तो बेड चार्ज भी कम से कम 1000 रु है इसलिये गरीब ही पिस्ता है  सहरों में इतनी भीड़ ह की कई बार सरकारी अस्पताल जाने में जाम में फस जाते हैं और बीमार की मौत हो जाती है यही हाल प्रसूता में होता है।

Hospitals of india
अस्पताल की सेवायें लोगों की पहुच से दूर है

अखबारों में सरकारी अस्पतालों की दुर्व्यवस्था की खबरें आती रहती हैं, शोर तब मचता है, जब इस दुर्व्यवस्था का शिकार कोई बड़ा आदमी होता है, लेकिन फिर हालात यथावत हो जाते हैं। सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने वही जाते हैं, जिनके पास कोई विकल्प नहीं होता या वे निजी अस्पतालों में इलाज कराने में असमर्थ होते हैं। सरकारी अस्पतालों में मूलभूत सुविधाओं का घोर अभाव रहता है, जैसे सफाई, बिस्तर, दवा, पानी व आहार का अभाव। इसी का फायदा निजी अस्पताल उठाते हैं। ऐसी भी खबरें आई हैं कि जब सरकारी अस्पतालों में औचक निरीक्षण हुआ, तब चिकित्सक वहां से नदारद थे। उन्हें सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी अस्पतालों में इलाज करते पाया गया। यह भी सही है कि सरकारी अस्पतालों में कई मरीजों की मौत चिकित्सकों के न रहने के कारण या नर्सों-वार्ड ब्वॉय द्वारा इलाज किए जाने के कारण हुई। डॉक्टर, जिनका स्थान हमारे समाज में भगवान-तुल्य है, उनमें कर्तव्य का बोध न होना एवं नैतिक मूल्यों का ह्रास होना मरीजों व मानवता के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।

 

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