जीवित्पुत्रिका( जिउतिया) व्रत, क्या हैं पौराणिक कथा ?

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jiyutiya vrat
जिउतिया व्रत बड़े धूम- धाम से बनाया जाता हैं।

हमारे देश में भक्ति एवम उपासना में से एक और रूप उपवास हैं। जो मनुष्य के अंदर सहनशीलता, त्याग, प्रेम और श्रद्धा को बढ़ाता हैं। उन्हीं में से एक जीवित्पुत्रिका वत्त हैं। कुछ जगहों पर इस व्रत को जिउतिया के नाम से भी जाना जाता हैं। यह व्रत अश्विन मास के कृष्ण पक्ष के अष्टमी तिथि में बड़े धूमधाम से मनाया जाता हैं। माताएं अपने संतान के लिए सुखी, स्वास्थ्य और दीर्घायु होने के लिए यह व्रत करती हैं। इस व्रत में विवाहित महिलाएं माता पार्वती की पूजा करती हैं और उनसे अपने संतान के लिए सुखशांति, दीर्घायु, वैभव के लिए प्रार्थना करती हैं।

इस दिन जो माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखती हैं। उनकी संतान के जीवन पर आने वाला हर संकट टल जाता हैं और संतान का वियोग भी नहीं सहना पड़ता हैं। इसलिए इस दिन माताएं निर्जल रहकर उपवास करती हैं। इस व्रत में माताएं पूरे दिन और रात भर पानी तक नहीं पीती हैं। संतान की सुरक्षा के लिए यह व्रत अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

व्रत कथा

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एक बार जीमूतवाहन गंधमादन पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे उस वक़्त अचानक से उनके कानों में एक वृद्ध स्त्री के रोने की आवाज पड़ी। उन्होंने उस महिला के पास जाकर उनसे रोने का कारण पूछा तो उस महिला ने कहा कि मैं शंखचूड़ नाग की माता हूं। आज भगवान विष्णु का वाहन गरूड़ शंखचूड़ को उठा कर ले जाएगा और उसे खा जाएगा। इसलिए मैं दु:खी होकर रो रही हूं।

यह बात सुनकर जिमूतवाहन ने कहा कि मैं आज आपके पुत्र के बदले गरूड़ जी का आहार बनूंगा और आपके पुत्र की रक्षा करूंगा। जब गरूड़ शंखचूड़ को लेने आए तो जीमूतवाहन शंखचूड़ बनकर बैठ गए। गरूड़ जीमूतवाहन को लेकर उड़ गए। लेकिन कुछ दूर जाने के बाद उसे एहसास हुआ कि वह शंखचूड़ की जगह एक मानव को उठा लाए हैं। गरूड़ जी ने पूछा कि हे मानव तुम कौन हो और मेरा भोजन बनने क्यों चले आए? इस पर जीमूतवाहन ने कहा कि वह राजा जीमूतवाहन हैं। उन्होंने बताया कि शंखचूड़ की माता को पु़त्र वियोग से बचाने के लिए मैं आपका आहार बनने चला आया। गरूड़ राजा दया की भावना से प्रसन्न हो गए। जीमूतवाहन को वरदान दिया कि तुम सौ वर्ष तक पृथ्वी का राज भोगकर बैकुंठ धाम जाओगे।

जीमूतवाहन के कारण शंखचूड़ की माता को पुत्र वियोग का दर्द नहीं सहना पड़ा। जिस दिन यह घटना हुई थी उस दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि थी। इसलिए तभी से इस व्रत का नाम जीवितपुत्रिका पड़ा और तभी से इस व्रत को किया जाने लगा।

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