और आज से शुरू हो जायेंगीं बुंदेलखंड में दिवाली की ये बधाईयाँ

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festive bundelkhand
बुन्देलखंडी उत्सव

बुंदेलखंड वैसे तो हमेशा से ही अपने सामाजिक पिछड़ेपन के कारण सुर्खियों में बना रहता है लेकिन यहाँ की संस्कृति भी अपनेआप में कई रंगों को समाये हुए है। दिवाली के अगले ही दिन से लोग अपने पारंपरिक अंदाज़ में बधाईयाँ देना शुरू कर देते है। ये नृत्य के रूप में अपनी बधाईयाँ लोगों तक पहुंचाते है। जिनका कोई ना कोई पौराणिक अर्थ होता है साथ ही लोक कहानियां भी इनमें सुनाई जाती है। चलिए जानते है ऐसे ही कुछ प्रचलित लोक नृत्यों के बारे में।

1. मोनिया या बरेदी नृत्य

मोनिया नृत्य

दिवारी गीत के गवईया सुबह से ही टुकड़ियों में शहर और गांव की गलियों में नृत्य के लिए घूमने लगे। इस अवसर पर गांव के चरवाहों (पशु पालक) ने नदी और तालाबों में नहाकर, श्रृंगार करके मौन व्रत धारण किया। इसी वजह से इन्हें मोनिया कहा जाता है। इनके साथ-साथ गायक, वादक, ढोल और मंजीरा लेकर लोग चलते नजर आए। गायक छंद गीत में स्वर छेड़ता रहा और वादक उसी धुन में वाद यंत्र का प्रयोग करते रहे।

मोनिया नृत्य या बरेदी नृत्य के बारे में लोगों का मानना है कि इसकी शुरुआत भगवान कृष्ण के समय हुई थी। वो ग्वालों के साथ मिलकर इसे किया करते थे। एक बार कंस ने सारे जानवरों को बंधक बना लिया। चरवाहे इससे बहुत दुखी थे। दीपावली के एक दिन बाद श्रीकृष्ण ने जानवरों को कंस से मुक्त करवाया। इसी खुशी में चरवाहों और ग्वालों ने नृत्य किया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है। चरवाहे नृत्य कर भगवान से अपने घर और जानवरों की सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं।

2. बुन्देली दीवारी नृत्य

बुन्देली दिवारी नृत्य

दिवारी पाई डंडा नृत्य नटवर भेष धारी श्री कृष्ण की लीला पर आधारित नृत्य है । जो उनके गाय चराने के समय यदुवंशीय युद्ध कला का परिचायक है l भाद्रपद की पंचमी से पौष – माघ माह की मकर संक्राति तक यह नृत्य होता है। बुंदेलखंड के खाशकर बाँदा जिले में गाँव – गाँव यादव जाति के युवा और बाल समूह बनाकर इसका प्रदर्शन करते है। इसमे समूह में लाठी चलाने की युद्ध कला , आत्मरक्षा हेतु वीरता प्रदर्शन , आग के गोले से निकलना , सजे हुए वेश में अपनी युद्ध कला का नाचते हुए कौशल के साथ मंचन ही इसकी आकर्षण शीलता है l इसके लिए घोर सर्दी , गर्मी में भी ये युवा गाँवो में आखाड़ा तैयार करके प्रशिक्षण लेते है।

नृत्य के समय आकर्षक वेश भूषा में लाल फुलरा गुल गंद, पाँव में घुंघरू ,सर में पगड़ी या साफी बांधकर छोटे – छोटे डंडे, लाठी से नाचना होता है। मूलतः यह नृत्य बुन्देली शौर्य को प्रमाणित करता है। प्रोफेसनल ट्रेनर और बड़ोखर खुर्द बाँदा के इस नटराज ट्रेडिसनल दीवारी रूरल बैंड के टीम लीडर रमेश पाल अपने बीस सक्रीय सदस्यों के साथ महावीरन के अखाड़े में बुंदेलो लोककला को निखारते है.सर्दी में भी खुले बदन लंगोट कसकर ये छोटे – बड़े साथी कठोर मेहनत से अपने हुनर को आने वाली अगली पीढ़ी में हस्तांतरित कर रहे है।

3. ढिमरयाई नृत्य

ढिमरयाई नृत्य

यह लोक नृत्य मूल रूप से ढीमर या केवट जाति के वर्ग के लोगों द्वारा किया जाने बल बुंदेलखंड का एक प्रमुख और प्रसिद्ध लोकनृत्य है। ढीमर या केवट जाति के समाज के लोग मछलीपालन और आखेट के समय यह नृत्य करते है। इस नृत्य में नृत्य करने बाले पुरुषों का परिधान धोती, बनड़ी होते हैं और इस नृत्य में प्रमुख बाद्य यंत्र ढोलक और सारंगी होती है।
देश में राई नृत्य को नयी पहचान दिलाने बाले श्री रामसहाय पांडेय और बुंदेलखंड के लोक गुरु कहे जाने श्री विष्णु पाठक का कहना है कि समय के साथ हर चीज बदल जाती है, लेकिन हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम अपनी लोकसंस्कृति से अपने बच्चों को परिचित करवाएं और अपनी विरासत को सहेज के रखें।

4. दुलदुल घोड़ी नृत्य

दुल-दुल घोड़ी नृत्य

यह नृत्य अब बुंदेलखंड के शहरी क्षेत्रों से लुप्त हो चूका है। इस नृत्य के बारे में बुंदेलखंड के लोक गुरु कहे जाने विष्णु पाठक ने बताया कि यह नृत्य जब दूल्हे राजा घोड़ी पर सवार होकर बारात के साथ निकलते थे तो बैंड पार्टी के साथ दुल दुल घोड़ी का नृत्य करने बाले कलाकार भी होते थे। ये नृत्य करने बाले पुरुष कलाकार साफा पहने हुए लकड़ी के घोड़ों की आकृति को कमर में बांधकर बैंड की धुन पर नृत्य किया करते थे।बुंदेली पारिवारिक नृत्य में कलश नृत्य है जो शिशु जन्म के समय बुआ द्वारा लाये गये बधाई के साथ किया जाता है। इस नृत्य की परम्परा आज भी मौजूद है।

5. कानड़ा नृत्य

कानड़ा नृत्य

भगवान कृष्ण या कान्हा से सम्बन्धित कानड़ा नृत्य को नया जीवन और नया सम्बल दिलाने वाले सागर के लक्ष्मीनारायण रजक ने कहा था कि किसी जमाने में कानड़ा नृत्यकों को समाज में इतना सम्मान मिलता था कि उन्‍हें जीविका चलाने के लिए कहीं और नहीं जाना पड़ता था।

वे बताते हैं कि पहले विवाह में पग-पग पर कनाड़‍ियाई होती थी। हल्दी ढ़ाते समय, मैहर का पानी भरते समय, मण्डप छपते समय, बारात विदा होते समय, बारात की अगुवानी में कनाड़ियाई होती थी। बिना कनड़ा नृत्य के शादी विवाह नहीं होते थे, लेकिन  आजकल कानड़ा का ट्रेंड खत्‍म हो चुका है।

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