नरक चतुर्दशी के ही दिन भगवान श्री कृष्ण ने असुर नरकासुर का वध किया

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NARAK CHATURDASHI
छोटी दीपावली

दीवाली के त्यौहार के आते ही समस्त वातावरण में एक अलग ही तरह का माहौल सा छा जाता है, क्योंकि यह त्यौहार पूरे पांच दिन का होता है सबसे पहले धनतेरह, फिर छोटी दीपावली यानी नरक चतुर्दशी आती है। इसे छोटी दीपावली इसलिए कहा जाता है क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले रात के वक्त उसी प्रकार दीए की रोशनी से अंधेरें को दूर भगा दिया जाता है जैसे दीपावली की हर जगह दीयें जलायें जाते हैं। इस दिन नरक चतुर्दशी 18 अक्टूबर (बुधवार) को है।

नरक चतुर्दशी की कथा

इस रात दीए जलाने की प्रथा के संदर्भ में कई पौराणिक कथाएं और लोकमान्यताएं हैं। एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी दु्र्दान्त असुर नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंदी गृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था, इस अवसर पर दीयें जलाये गये और खुशियां मनायी गयी।

अन्य प्रचलित कथा

इस दिन के व्रत और पूजा के संबध में एक अन्य कथा यह भी है कि रन्ति देव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा थे। उन्होंने अनजाने में भी कोई पाप नहीं किया था लेकिन जब मृत्यु का समय आया तो उनके समझ यमदूत आ खड़े हुए। यमदूत को सामने देख राजा अचंभित हुए और बोले मैंने तो कभी कोई पाप कर्म नहीं किया फिर आप लोग मुझे लेने क्यों आए हो क्योंकि आपके यहां आने का मतलब है कि मुझे नर्क जाना होगा। आप मुझ पर कृपा करें और बताएं कि मेरे किस अपराध के कारण मुझे नरक जाना पड़ रहा है। पुण्यात्मा राज की अनुनय भरी वाणी सुनकर यमदूत ने कहा हे राजन् एक बार आपके द्वार से एक ब्राह्मण भूखा लौट गया यह उसी पापकर्म का फल है।

दूतों की इस प्रकार कहने पर राजा ने यमदूतों से कहा कि मैं आपसे विनती करता हूं कि मुझे वर्ष का और समय दे दे। यमदूतों ने राजा को एक वर्ष की मोहलत दे दी। राजा अपनी परेशानी लेकर ऋषियों के पास पहुंचा और उन्हें सब वृतान्त कहकर उनसे पूछा कि कृपया इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय है। ऋषि बोले हे राजन् आप कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करें और ब्रह्मणों को भोजन करवा कर उनसे अनके प्रति हुए अपने अपराधों के लिए क्षमा याचना करें।
राजा ने वैसा ही किया जैसा ऋषियों ने उन्हें बताया। इस प्रकार राजा पाप मुक्त हुए और उन्हें विष्णु लोक में स्थान प्राप्त हुआ। उस दिन से पाप और नर्क से मुक्ति हेतु भूलोक में कार्तिक चतुर्दशी के दिन का व्रत प्रचलित है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाकर और पानी में चिरचिरी के पत्ते डालकर उससे स्नान करने का बड़ा महात्मय है। स्नान के पश्चात विष्णु मंदिर और कृष्ण मंदिर में भगवान का दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायक कहा गया है। इससे पाप कटता है और रूप सौन्दर्य की प्राप्ति होती है। इसीलिये इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर तेल लगाने की परंपरा है

पूजन विधि
इस दिन सूर्योदय के बाद उठ कर चन्दन के लेप को शरीर पर लगा कर स्नान करे, नहाने के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य दे उसके बाद शरीर पर तेल व तिल लगाए। इस दिन भगवन श्री कृष्णा की उपासना की जाती है रात के समय में घर की दहलीज़ पर दीप जलाये जाते है और यमराज की पूजा की जाती है इसके आलावा आप हनुमान जी की अर्चना भी करे और किसी मीठे पकवान का भोग लगायें।

अभ्यंग स्नान समय :
04:47:00 से 06:23:24 तक

 

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