नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की अराधना क्यों की जाती है?

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नवरात्रि के प्रथम दिन माॅं शैलपुत्री की पूजा की जाती है

नवरात्रि के प्रथम दिन माँ दुर्गा के जिस रूप की अराधना की जाती है, उन्हें शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा और उपासना की जाती है। यह नवदुर्गाओं में से प्रथम दुर्गा है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण माँ दुर्गा के इस रूप का नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा।

नवरात्रि के दौरान माँ दुर्गा के शैलपुत्री रूप की अराधना करने से अनेक आपदाओं से मुक्ती मिलती है। इसलिए किसी भी स्थान पर घर बनाने से पहले माँ शैलपुत्री की स्थापना की जाती है। मान्यता है कि इनकी स्थापना से वह स्थान सुरक्षित हो जाता है। माँ की प्रतिमा स्थापित करने से उस स्थान पर आपदा, रोग, व्याधि, संक्रमण का ख़तरा नहीं होता और मनुष्य निश्चिंत होकर इस स्थान पर अपना जीवन व्यतीत करता है।

शास्त्रों के अनुसार माता शैलपुत्री का स्वरूप अति दिव्य है। माँ के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और माँ के बाहिने हाथ में कमल का पुष्प है। माँ शैलपुत्री बैल पर सवार होती है और इन्हें समस्त जीव-जंतुओं का रक्षक माना जाता है।

माँ शैलपुत्री की कथा:-

माँ पार्वती अपने पूर्वजन्म में प्रजापति दक्ष के घर में कन्या के रूप में जन्म लिया था। तब इनका नाम ‘सती’ था और इनका विवाह भगवान शंकर से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रिण दिया। किन्तु दक्ष ने शंकर जी को इस यज्ञ में निमंत्रिण नहीं दिया। देवी सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे है तो वहाॅं जाने के लिए उनका मन व्याकुल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने भगवान शकंर को बताई।

भगवान शिव ने सारी बातें सुनकर विचार करके कहा, प्रजापति दक्ष किसी कारण हमसे रूष्ट है। अपने यज्ञ में उन्होंने सभी देवताओं को आंमत्रित किया है। किन्तु जान-बूझकर हमें नहीं बुलाया। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाॅं जाना उचित नहीं होगा। लेकिन पिता का यज्ञ देखने और माता-बहनों से मिलने की सती की व्याकुलता कम नहीं हुई। उनका प्रबल आग्रह देखते हुए भगवान शंकर ने उन्हें वहाॅं जाने की अनुमति दे दी।

माता सती ने अपने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा और सारे लोग मुॅंह फेरे हुए है। केवल उनकी माँ ने उन्हें स्नेह से गले लगाया।

परिजनों और बहनों के इस व्यवहार से देवी सती के मन को बहुत ठेस पहुॅंचा। देवी सती ने देखा कि सभी परिजनों में शिव जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है और प्रजापति दक्ष ने भी शिव जी के प्रति कुछ अपमान जनक वचन कह डाले थे।

यह सब देखकर माता सती का मन ग्लानि और क्रोध से भर गया। उन्होंने सोचा कि भगवान शिव जी की बात न मानकर, उन्होंने बहुत बड़ी गलती की है। माता सती अपने पति भगवान शिव का अपमान नहीं सहन कर पाई और उन्होंने अपने देह को अग्नि के हवाले कर भस्म कर दिया। इस दु:खद समाचार को सुनने के बाद शिव जी क्रोधित हो गए। उन्होने अपने गणों को भेजकर दक्ष के यज्ञ का पूर्णतया: विध्वस करा दिया।

देवी सती ने अग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर, अगले जन्म में शैलराज हिमालय के यहाॅं पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वह शैलपुत्री के नाम से विख़्यात हुई। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के अन्य नाम है। शैलपुत्री देवी का विवाह भी शिव से ही हुआ। पूर्वजन्म की भाँति वह इस बार भी शिव जी की अर्धांगिनी बनी। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत है।

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