वास्तुशास्त्र के अनुसार घर की आंतरिक सजावट करे, नहीं तो पड़ सकता हैं बुरा प्रभाव

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vastu shastra
वास्तुशास्त्र के अनुसार अपने घर की सजावट करे

सभी धर्मों के लोग अपने देवीदेवताओं पर असीम श्रद्धा एवं विश्वास रखते हैं। साथ ही उनसे संबंधित तस्वीरों एवं मूर्तियों को अपने घरों में सजा कर रखते हैं। आंतरिक सज्जा के साथ ही विभिन्न प्रकार के संकट दूर करने के लिए भी घरों में देवीदेवताओं के चित्र तथा स्वास्तिक आदि बना देते हैं। दीवारों पर अनेक प्रकार के श्लोक या स्लोगन भी लिख दिए जाते हैं।

वास्तुशास्त्र के मुताबिक उचित दिशाओं में देवीदेवताओं की तस्वीरों, मूर्तियों, श्लोकों, स्लोगनों आदि को रखने या लिखने पर ही घर और व्यापार में सुख, शांति एवं समृद्धि की बढ़ोत्तरी होती है। घर की आंतरिक साजसज्जा वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार न करने पर बुरे प्रभाव पड़ते है। गृह स्वामी या कार्यालय के मालिक के कक्ष में गणेश जी की प्रतिमा या तस्वीर ठीक सामने लगानी चाहिए। पीठ के पीछे चित्र लगाना दोषकारक होता है।

अनेक व्यक्ति अपने घर के दरवाजे के ऊपर स्वास्तिक का निशान बना देते हैं, यह गलत है। दरवाजे़ के दोनों ओर स्वास्तिक का निशान बना कर उसके ऊपर वाले भाग पर ओम या कलश बनाने से लाभदायक एवं मंगलकारी होता है। जोड़े में स्वास्तिक का चिन्ह बनाना चाहिए, इससे लाभ प्राप्त होता हैं।

माना जाता है कि भवन के मध्य भाग में सूर्य अथवा विष्णु का निवास होता है। यह स्थान हृदय के भाग की तरह होता है। इस स्थान पर कभी भी भारी वस्तु जैसे कि भारी फर्नीचर, अलमारी आदि नहीं रखनी चाहिए। आज के समय में व्यापारिक संस्थानों में व्यक्ति श्री गणेश जी की मूर्त की स्थापना करते हैं। व्यापारिक संस्थानों, ऑफिस आदि में अगर कोई मूर्त लगानी ही हो तो इस प्रकार लगानी चाहिए कि ऑफिस अथवा व्यावसायिक संस्थान में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की नजर उस पर आसानी से पड़ सके।

घर में पूजा स्थल इस प्रकार से बनाना चाहिए कि पूजा करने वाला व्यक्ति पूर्व या पश्चिम दिशा में बैठकर पूजा कर सके। पूर्व दिशा में इंद्र देव का आधिपत्य होता हैं, यह सर्वाधिक प्रभावशाली दिशा है। कार्यालयों या अन्य स्थानों पर यदि पूर्व दिशा की ओर मुख करके काम किया जाए तो मन में शांति एवं अच्छे विचारों का सृजन होता है।

दक्षिण दिशा के स्वामी यम हैं। इन्हें न्यायकर्ता माना जाता है। कार्यालय में इस दिशा की ओर मुख करके कार्य करने वाला व्यक्ति व्यवसाय में बढ़ोत्तरी करता है। सक्रिय चिंतन एवं बिजनैस डीलिंग की सफलता इस दिशा का मुख्य कार्य होता है। दक्षिणपश्चिम कोण के अधिपति नैत्रदत हैं। यह विनाश की देवी हैं। इसके प्रभाव से व्यक्ति निंदाग्रस्त, निर्धन एवं जुआरी होता है। अत: इस कोण में बैठकर कोई भी ठोस निर्णय नहीं लेना चाहिए। इस दिशा में बैठकर काम करने वाला व्यक्ति दिमागी तौर पर उत्तेजित रहता है तथा क्रूर निर्णय लेने में भी हिचकता नहीं है।

पश्चिम दिशा पर वरुण का आधिपत्य होता है। इस दिशा की ओर मुख करके पढ़नालिखना तथा पूजापाठ करना शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा में कुबेर का स्थान है। इस दिशा में मूल्यवान वस्तुओं को रखना लाभदायक होता है। इस दिशा का संबंध धन से होता है।

पूजा स्थल पर श्री यंत्र, त्रिकोण यंत्र, सर्वव्याधि शांति यंत्र, दुर्गा यंत्र, गणेश यंत्र आदि को रख कर उनकी पूजा एवम उपासना आदि करना शुभ माना जाता है। यंत्रों का निर्माण एवं उनकी प्राणप्रतिष्ठा शुभ लग्नों में होनी चाहिए। देवीदेवताओं के चित्र शौचालय से लगी दीवारों पर नहीं टांगने चाहिए। जहां तक संभव हो देवीदेवताओं के चित्रों को आसन बिछा कर उन पर ही रखा जाना चाहिए। इस पद्धति से हमेशा उनकी कृपा दृष्टि प्राप्त होती रहती है।

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