नवरात्रि में नवमी का क्या महत्व है ?

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सिद्धिदात्री माॅं सौम्य और करूणा की देवी है

नवरात्रि का त्यौहार भारत में हिन्दू धर्म ग्रंथ एवं पुराणों के अनुसार माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरुपों की आराधना का श्रेष्ठ समय होता है।  इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रों में लोग अपनी मनोकामना सिद्ध करने के लिए अनेक प्रकार के उपवास, संयम, नियम, भजन, पूजन योग साधना आदि करते हैं।

नौ दिनों तक चलने वाले ‘नवरात्रि’ का समापन महानवमी पर होता है। नवरात्रि के व्रत में हर तरफ़ भक्ति का माहौल रहता है। नवमी के दिन माता सिद्धिदात्री की पूजा होती है। माँ दुर्गा अपने नौवें स्वरूप में सिद्धिदात्री के नाम से जानी जाती हैं। आदि शक्ति भगवती का नौवा रूप सिद्धिदात्री है, जिनकी चार भुजाएँ हैं। उनका आसन कमल है, साथ ही माता का वाहन सिंह है। माॅं सिद्धिदात्री का स्वरूप बहुत ही सौम्य और करूणामय है। माता चतुर्भुजा धारी है, माता के दाए तरफ हाथ में चक्र और गदा धारण किया है, बाई ओर हाथ में शंख और कमल पुष्प है। माँ सिद्धिदात्री सुर और असुर दोनों के लिए पूजनीय हैं। जैसा कि माँ के नाम से ही प्रतीत होता है कि माँ सभी प्रकार इच्छाओं को पूरा करती हैं। ऐसा माना जाता है कि देवी का यह रूप यदि भक्तों पर प्रसन्न हो जाता है, तो उसे 26 वरदान मिलते हैं। हिमालय के नंदा पर्वत पर सिद्धिदात्री का पवित्र तीर्थ स्थान है।

शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है।

महिषासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए नौ दिनों तक माँ दुर्गा और महिषासुर का महासंग्राम चला, अंततः महिषासुर का वध करके माँ दुर्गा महिषासुरमर्दिनी कहलाईं। तभी से हर्षोल्लास के साथ नवरात्रि पूजा का शुभारम्भ हुआ।

एक दूसरी कथा के अनुसार जब राम को युद्ध में रावण को पराजित करना था। तब श्रीराम ने नौ दिनों तक व्रत और पूजा विधि के अनुसार चंडी पूजन की और युद्ध में विजय हासिल की। अधर्म पर धर्म की इस विजय के कारण लोगो ने नवरात्रि का पूजन शुरू किया था।

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