वन्यजीव को बचानें के लिए सरकार की अब तक की सबसे बड़ी पहल:- जानें खास बातें

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Wildlife and its Conservation in India
पर्यावरण सुरक्षा

सरकार ने 2017-31 के लिए तीसरी राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना (एनडब्ल्यूएपी) जारी कर दी है। इस योजना को हाल ही में ग्लोबल वाइल्ड लाइफ प्रोग्राम (जीडब्ल्यूपी) की बैठक में जारी किया गया था। जिसमें वन्यजीव अपराध से निपटने के लिए 19 एशिया और अफ्रीकी देशों, संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और अन्य प्रमुख वैश्विक संगठन शामिल हैं।एनडब्ल्यूएपी 2017-31, जिसके तहत 250 परियोजनाएं हैं, अगले 15 वर्षों के लिए वन्यजीवों के संरक्षण के लिए भारत का रोड मैप है। योजना संयुक्त राष्ट्र के 15 वीं सशक्त विकास लक्ष्य – “जीवन पर भूमि” के एजेंडे के आसपास बुनाई गई है। नई योजना में प्रमुख रणनीतिक बदलाव सभी वन्यजीवों के संरक्षण में “परिदृश्य दृष्टिकोण” अपनाना है अवांछित वनस्पति (पौधों) और पाबंदी (जानवरों) – उन जगहों के बजाय जहां वे होते हैं

इसका मतलब यह है कि जब तक अब तक वन्यजीव से संबंधित कार्यक्रम और योजनाएं राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों पर और आसपास केंद्रित थीं, अब ये रणनीति क्षेत्र के परिदृश्य पर आधारित होगी जो कि अकेले आरक्षित वन व्यवस्था तक सीमित नहीं होगी।

इस योजना को पांच घटकों में विभाजित किया गया है, जिसे आगे 103 संरक्षण कार्यों में ले जाने वाले 17 विषयों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक विषय में संरक्षण कार्यों और परियोजनाओं का एक सेट है – 250, सभी में।

योजना में विशेष जोरमनुष्य-पशु संघर्ष शमन, जलवायु परिवर्तन के अनुकूल, पारिस्थितिक पर्यटन प्रबंधन, मानव संसाधन विकसित करने, मानव संसाधन विकसित करने, रेडियो कॉलर और ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीक के माध्यम से शोध और निगरानी को मजबूत करने और वन्यजीव क्षेत्र को निधि प्रदान करने के लिए सुनिश्चित किया गया है।

यह योजना सभी वन्यजीवों के संरक्षण में “परिदृश्य दृष्टिकोण” को गोद लेती है – अवांछित वनस्पतियों और जीवों – जो पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जाति के लिए एक पारिस्थितिक मूल्य है, चाहे वे कहाँ होते हैं यह उनके निवासों के संरक्षण के दौरान वन्यजीवों की धमकी वाले प्रजातियों की वसूली के लिए विशेष बल देता है।

सरकार ने वन्यजीव संरक्षण में निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया है। योजना यह बताती है कि केंद्र सुनिश्चित करेगा कि राष्ट्रीय वन्यजीव कार्य योजना कार्यान्वयन के लिए कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व निधि सहित पर्याप्त और निरंतर धन उपलब्ध कराया जाएगा।

पृष्ठभूमि:

भारत विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के साथ संयुक्त रूप से वैश्विक वन्यजीव कार्यक्रम (जीडब्ल्यूपी) की मेजबानी कर रहा है। जीडब्ल्यूपी एशिया और अफ्रीका के 19 देशों में अवैध वन्यजीव व्यापार से संबंधित मुद्दों को संबोधित करेगा। यह वन्यजीव संरक्षण के शासन में सुधार के लिए वन्य जीवन के अवैध शिकार को रोकने के लिए मैदान पर कार्रवाई में ज्ञान का समन्वय और समन्वय करने के लिए एक मंच के रूप में कार्य करेगा।

केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवद्र्धन ने कहा, क्लाइमेट चेंज का असर भी वन्यजीव प्रबंधन का हिस्सा..15 साल तक देश के संरक्षित क्षेत्र में इसी के अनुरूप उठाए जाएंगे कदम

उत्तराखंड है खास

देहरादून (केदार दत्त) देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 4.9 फीसद हिस्से में पसरे संरक्षित क्षेत्र के लिए नेशनल वाइल्ड लाइफ एक्शन प्लान (एनडब्ल्यूएपी) जारी कर दिया गया है। वन्यजीव संरक्षण के मद्देनजर अगले 15 साल तक इसी प्लान के अनुरूप कार्य होंगे। दिल्ली में ग्लोबल वाइल्ड लाइफ प्रोग्राम के तहत हुई कांफ्रेंस में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ.हर्षवद्र्धन ने एक्शन प्लान जारी किया। इसमें पहली बार क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) से वन्यजीवों पर पड़ने वाले असर को भी वन्यजीव प्रबंधन का हिस्सा बनाया गया है।

uttrakhand
उत्तराखंड

देशभर में 700 के लगभग राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, कंजर्वेशन रिजर्व हैं। इनमें वन्यजीव संरक्षण के लिए 1983 से 15 वर्षीय एक्शन प्लान बनाने की कसरत प्रारंभ हुई। इस कड़ी में देश का यह तीसरा वाइल्ड लाइफ एक्शन प्लान है। दिल्ली कांफ्रेंस में शिरकत कर रहे उत्तराखंड के अपर प्रमुख मुख्य वन संरक्षक वन्यजीव डॉ. धनंजय मोहन के मुताबिक, एक्शन प्लान वन्यजीव संरक्षण के लिए पॉलिसी और एक्शन का कार्य करेगा। डॉ.धनंजय बताते हैं कि नए प्लान में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में आने वाली चुनौतियों से निबटने पर मुख्य फोकस होगा। यही नहीं, पहली बार जलवायु परिवर्तन से वन्यजीवों पर पड़ने वाले असर को भी वन्यजीव प्रबंधन एवं नियोजन का हिस्सा बनाया गया है।

उत्तराखंड में 15 फीसद क्षेत्र संरक्षित: 71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 14.8 फीसद हिस्सा संरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत है। इसमें छह नेशनल पार्क, सात अभयारण्य, तीन कंजर्वेशन रिजर्व शामिल हैं। डॉ.धनंजय ने बताया कि अब नए वाइल्डलाइफ एक्शन प्लान के तहत ही उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण से जुडे़ कार्य किए जाएंगे।

 एक्शन प्लान का सफर

देश में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 के अस्तित्व में आने के बाद एक्शन प्लान तैयार करने पर जोर दिया गया। केंद्रीय स्तर पर तय हुआ कि यह प्लान 15 साल के लिए होगा। देश का सबसे पहला नेशनल वाइल्डलाइफ एक्शन प्लान 1983 से 2001 के लिए बना।

इसके बाद दूसरा प्लान 2002 से 2016 के लिए बनाया गया। अब 2031 तक के लिए तीसरा एक्शन प्लान जारी किया गया है, जिसके बनने की प्रक्रिया 2014 से प्रारंभ हो गई थी।

नई दिल्ली में ग्लोबल वाइल्ड लाइफ प्रोग्राम के तहत हुई कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने इसे जारी किया। इसमें पहली बार क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) से वन्यजीवों पर पड़ने वाले असर को भी वन्यजीव प्रबंधन का हिस्सा बनाया गया है। डॉ. धनंजय बताते हैं कि नए प्लान में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में आने वाली चुनौतियों से निबटने पर मुख्य फोकस होगा। यही नहीं, पहली बार जलवायु परिवर्तन से वन्यजीवों पर पड़ने वाले असर को भी वन्यजीव प्रबंधन एवं नियोजन का हिस्सा बनाया गया है।

उत्तराखंड में 15 फीसद क्षेत्र संरक्षित

71 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 14.8 फीसद हिस्सा संरक्षित क्षेत्र के अंतर्गत है। इसमें छह नेशनल पार्क, सात अभयारण्य, तीन कंजर्वेशन रिजर्व शामिल हैं। डॉ.धनंजय ने बताया कि अब नए वाइल्डलाइफ एक्शन प्लान के तहत ही उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कार्य किए जाएंगे।

एनडब्ल्यूएपी (2017-2031):- 05 कंपोनेंट्स, 17 थीम्स,103 कंजर्वेशन एक्शन,250 प्रोजेक्ट

जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहा है करोड़ो का नुकसान

भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे नुकसान हर साल लगभग 9-10 अरब डॉलर खर्च हो रहा है। इसके साथ ही 2020 के अंत तक इसके कारण जलवायु में भारी परिवर्तन के अनुमान है जो गंभीर रुप से कृषि उत्पादकता को प्रभावित करेंगे। हाल ही में संसदीय समिति में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए कृषि मंत्रालय ने कहा कि प्रमुख फसलों की उत्पादकता अगले कुछ सालों में सीमित हो जाएगी, लेकिन अगर विशेष रुप से जलवायु परिवर्तन न हो तो 2100 तक बढ़कर 10-40 फीसद हो सकती है।

गेहूं, चावल, तिलहन, दालों, फलों और सब्जियों की पैदावार दिखाई देगी, ऐसे में किसानों को उनकी भरपाई के लिए जलवायु परिवर्तन के अनूकूल अलग-अलग फसलों के पैटर्न को अपनाने की आवश्यकता होगी। अगर जलवायु परिवर्तन में और अधिक गिरावट आई तो यह भारत को दूध और दालों का प्रमुख आयातक बना देगा। 2030 तक, 2016-17 में अनुमानित उत्पादन से 65 लाख टन अधिक अनाज की आवश्यकता हो सकती है।

हाल के आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि “भारत में चरम मौसम परिवर्तन की घटनाओं के कारण सालाना 9-10 अरब अमरीकी डॉलर का नुक्सान है। इनमें से लगभग 80% का नुक्सान अस्पष्ट है”। इसमें बताया गया है कि 2014 में कश्मीर में आई बाढ़ से 15 अरब डॉलर से ज्यादा की लागत आई और इसी साल आए चक्रवात हुडहुड से 11 अरब डॉलर खर्च हुए।

मंत्रालय ने अपने रिपोर्ट में कहा कि हालांकि ज्यादातर फसल के उत्पादन में कमी देखी जा सकती है लेकिन जलवायु परिवर्तन में सोयाबीन, चना, मूंगफली, नारियल (पश्चिमी तट में) और आलू (पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में) की पैदावार को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। बहरहाल, आलू का उत्पादन शेष भारत में, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और दक्षिणी पठार क्षेत्र में घट जाएगा।

भारतीय वन्यणजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई)

1982 में भारतीय वन्यणजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) की स्थापना की गई थी। यह संस्थान वन्यजीवन पर अनुसंधान तथा प्रबंधन के विभिन्न अकादमिक पाठ्यक्रमों को संचालित करता है। संस्थान इन दिनों एक देशव्यापी शोध कर रहा है, जिसका विषय जैव विविधता तथा इससे जुड़े हुए पहलुओं पर अनुसंधान है।

wild life institute of india
भारतीय वन्यजीव संस्थान

भारतीय पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) एक सांविधिक निकाय है, जिसकी स्थापना जीव-जंतुओं के प्रति क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के खंड 4 के अंतर्गत की गई है। इसका मुख्यालय चेन्नई में स्थित है। बोर्ड का प्रमुख कार्य सरकार को पशुओं के कल्याण से संबंधित मुद्दों पर सलाह देना तथा पशु कल्याण के लिए जागरुकता फैलाना है। एडब्ल्यूबीआई कई राज्यों में पशु कल्याण संगठनों तथा मॉडल गौशालाओं को बायोगैस संयंत्र स्थापित करने, सूखे व अकाल से राहत तथा भूकंप से राहत आदि कार्यों के लिए आर्थिक सहायता देता है।

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण संगठन, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अधीन एक नोडल एजेंसी के रूप में कार्य करता है और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत की ओर से प्रतिबद्धताओं की पूर्ति के लिए अधिकृत है।

 

 

 

 

 

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