बैंकों के ‘बैड लोन्स’ में हुई ताबड़तोड़ वृद्धि

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bad loans
‘बैड लोन्स’

कई महीनों से बैड लोन्स सुर्खियों में बना रहा है लेकिन एक बार फिर से एक आर.टी.आई के माध्यम से ली गई एक जानकारी ने हमें फिर से ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या इस समस्या अभी तक कोई कारगार उपाय नही निकला है? यह जानकारी आर.बी.आई के हवाले से दी गई है।

जून, 2017 तक भारतीय बैंकों के ‘बैड लोन्स’ के स्तर में रिकॉर्ड तोड़ 146 बिलियन डॉलर यानी कि 9.5 ट्रिलियन रुपए की वृद्धि दर्ज़ की गई है। इससे यह पता चलता है कि एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में अभी भी बैड लोन्स संबंधी समस्या पर नियंत्रण रखने के लिये कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है।

debt in indian banks
‘बैड लोन्स’ का असर

प्रमुख बातें

  1. दरअसल, सूचना के अधिकार के आवेदनों के माध्यम से रिज़र्व बैंक के आँकड़ों की समीक्षा करने के उपरान्त यह पता चला कि वर्ष 2017 के प्रथम छह महीनों में कुल ‘स्ट्रेस्ड ऋणों’ (stressed loans) में 5% की वृद्धि हुई है, जबकि वर्ष 2016 के अंतिम छह महीनों में इसकी वृद्धि दर 5.8% थी।
  2. बता दें कि स्ट्रेस्ड ऋणों में गैर- निष्पादित परिसंपत्तियों (Non Performing Assets-NPA) और पुनर्गठित (restructured) अथवा डूबते हुए ऋणों (rolled over loans) को शामिल किया जाता है।
  3. यद्यपि भारत की कंपनियों के लिये फंडिंग का मुख्य स्रोत बैंक ही हैं, परन्तु खराब ऋणों की समस्या के चलते बैंकों के लाभों में गिरावट आई है तथा उन्होंने मुख्यतः उन छोटी फर्मों को ऐसे समय में नई उधारियाँ देने से इनकार कर दिया है, जब उन पर निर्भर भारतीय अर्थव्यवस्था धीमी गति से प्रगति कर रही है।
  4. विगत तीन वर्षों में अप्रैल-जून माह के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था वृद्धि दर काफी सुस्त रही है । अतः यह भारत सरकार के लिये चिंता का विषय बन गया है। विश्लेषक मानते हैं कि छोटी फर्मों के लिये बैड लोन में होने वाली वृद्धि और रिटेल उधारियाँ चिंताजनक हैं तथा ये अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के लिये नए ऋणों को प्रोत्साहित करने में अपेक्षाकृत अल्प भूमिका ही निभाएंगे।
  5. वस्तुतः कॉर्पोरेट क्षेत्र में यह एक रिकग्निशन चक्र (recognition cycle) है, जो कि शीघ्र ही समाप्त होने वाला है, क्योंकि इससे बैंक, रिज़र्व बैंक और अन्य नियामकों के दबाव में आ जाएंगे।
  6. सार्वजनिक क्षेत्र के देनदारों में शामिल वरिष्ठ बैंकर (जिनका योगदान भारतीय बैंकिंग संपत्ति के तीन-चौथाई भाग में है) भी इस बात पर सहमत हैं कि बैंकिंग व्यवस्था के लिये आने वाले माह काफी तनावग्रस्त होंगे।
  7. स्ट्रेस्ड लोन्स वर्ष 2017 के जून माह तक कुल ऋणों का 6% हो गए हैं। विदित हो कि यह विगत 15 वर्षों में स्ट्रेस्ड लोन्स का सबसे उच्चतम स्तर है।

बैड लोन्सक्या है?

ऐसे ऋण जहाँ लिये गए ऋणों का पुनर्भुगतान देनदार और लेनदार के मध्य पूर्व सहमति से किये गए समझौते के अनुरूप नहीं किया जाता तथा जिनका भुगतान कभी नहीं होता, उन्हें ‘बैड लोन्स’ (Bad loans) कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति ऋण लेता है तथा उसका पुनः भुगतान नहीं करता है तो उसे भविष्य में आसानी से ऋण प्राप्त नहीं हो पाता तथा बैंक उसे दिये गए ऋण को ‘बैड लोन’ की श्रेणी में शामिल कर देता है, जिसका तात्पर्य यह है कि वह ऋण देनदार के लिए एक जोखिम है।

परन्तु यदि व्यक्ति के ऋण को ‘बैड लोन्स’ की श्रेणी में रखा गया हैं और वह पुनः नया ऋण लेना चाहता है तो वह इसे उन देनदारों से प्राप्त कर सकता है, जो ऋण देने के लिये उसके द्वारा लिये गए पूर्व ऋणों की जाँच ही नहीं करते। ‘बैड संपत्ति’ (bad asset) को उसकी समयावधि के आधार पर खराब संपत्ति (substandard asset) संदिग्ध संपत्ति (doubtful asset) और नुकसानदायक संपत्ति (loss assets) में वर्गीकृत किया जाता है।

क्या होतीं है स्ट्रेस्ड संपत्तियाँ

NPA
‘स्ट्रेस्ड संपत्तियाँ’

‘स्ट्रेस्ड संपत्तियां’ बैंकिंग व्यवस्था के स्वास्थ्य की महत्त्वपूर्ण सूचक हैं। इसे समझने के लिये हमें गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियों (Non Performing Assets-NPA) और पुनर्गठित ऋणों को समझना होता है। बैंकिंग व्यवस्था की संपत्ति को दिये गए ऋणों और बैंकों द्वारा किये गये निवेशों (बांड) के रूप में परिभाषित किया जाता है। संपत्ति की गुणवत्ता इस बात की सूचक होती है कि लेनदार द्वारा लिये गए कितने ऋणों का पुनर्भुगतान ब्याज और मूलधन के रूप में किया जा चुका है। संपत्ति की गुणवत्ता की जाँच का सबसे अच्छा पैमाना गैर- निष्पादनकारी परिसंपत्तियां ही हैं।

अर्थव्यवस्था पर असर

गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियाँ (non-performing assets-NPA) किसी भी अर्थव्यवस्था के लिये बोझ हैं। ये देश की बैंकिंग व्यवस्था को रुग्ण बनाते हैं। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से ‘बैड लोन’ और ‘बैड एसेट’ (ख़राब परिसम्पत्तियाँ) में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

बता दें कि ‘गैर-निष्पादनकारी परिसंपत्तियाँ’, बैड लोन और बैड एसेट से ही मिलकर बनती हैं। बैड लोन से बैंको के लाभांश में कमी आती है, फलस्वरूप बैंक के लिये ऋण देना मुश्किल हो जाता है। जब बैंकों के लिये ऋण देना मुश्किल हो जाता है तो फिर निवेश में कमी आने लगती है और जब निवेश में कमी आने लगे तो अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिलता है।

एनपीए का प्रबंधन करना अत्यंत ही दुष्कर कार्य है, हम इस पर जितना ही लगाम लगाने की कोशिश करते हैं यह उतना ही बेकाबू होता जाता है। मान लिया जाए कि किसी बैंक ने किसी संस्था को कुछ राशि ऋण के तौर पर दी है, जब बैंक ने ऋण दिया था तब तो परिस्थितियाँ ऐसी थी कि संस्था द्वारा ऋण राशि को चुकाया जाना आसान लग रहा था। लेकिन बाद में प्रतिकूल हालातों में संस्था ऋण चुकाने में असमर्थ हो गई।

यदि बैंक उसे वित्तीय संकटों से उबारने के उद्देश्य से और ऋण देता है तो इस बात का डर लगातार बना रहता है कि कहीं बाद में दिया गया ऋण भी न डूब जाए। इस प्रकार से एनपीए किसी भी अर्थयवस्था के लिये बिगड़ैल बैल के जैसा ही है।

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