जानें क्या होती है बायोलॉजिकल क्लॉक:- हमारें पूरे दिन को करतीं है प्रभावित

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बायोलॉजिकल क्लॉक

हमारें शारीरिक परिवर्तनों का पता हमें भी नही चलता लेकिन ये हमारें लिए कितनें महत्वपूर्ण इसका इंदाज़ा इसी बात से ही लगाया जा सकता है यह परिवर्तन हमारी रोज़ की दिनचर्या को हर तरीकें से प्रभावित करतें हैं|

आईये जानतें है विस्तार से…

प्राणियों के आंतरिक जैविक घड़ी यानी बायोलॉजिकल क्लॉक के बारे में महत्वपूर्ण शोध करने के लिए अमेरिका के तीन वैज्ञानिकों जेफरी सी. हॉल (72), माइकल रॉसबैस (73) और माइकल डब्ल्यू यंग (68) को 2017 के चिकित्सा के नोबल पुरूस्कार के लिए चुना गया है। आपको बता दे कि बायोलॉजिकल क्लॉक के जरिए ही जीवित प्राणियों में जागने-सोने और अन्य जैविक प्रक्रियाओं का संचालन होता है। नोबेल असेंबली ने यह जानकारी दी। इसके मुताबिक, तीनों वैज्ञानिकों ने बायोलॉजिकल क्लॉक को नियंत्रित करने में अहम भूमिका निभाने वाले जीन का पता लगाया है। इसे पीरियड जीन का नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों ने फ्रूट फ्लाई (वैज्ञानिक नाम ड्रोसोफिला मेलानोगेस्टर) पर शोध कर इसका पता लगाया है। यह क्लॉक नींद के अलावा खानपान, हार्मोन और शरीर के तापमान को निर्धारित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नोबेल टीम ने कहा, ‘उनकी खोज ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि पृथ्वी की परिक्रमा के साथ पेड़-पौधे, पशु और मनुष्य।

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कई फायदें है बायोलॉजिकल क्लॉक के

क्या है बायोलॉजिकल क्लॉक

अलग-अलग मामलों में इसकी परिभाषा अलग दी गई है। सीधे तौर पर समझने की कोशिश करें तो हमारे शरीर की मांसपेशियां दिन के समय को समझने की कोशिश करती हैं। शरीर के हर हिस्से में एक बायोलॉजिकल क्लॉक चल रही होती है। इसी घड़ी के हिसाब से हार्मोन्स हमारी बॉडी में बनते रहते हैं। इसमें पीरिड्स आने से लेकर, समय पर नींद आना, टॉयलेट जाना, लंच टाइम तक एक्टिव रहना, लंच के बाद खाना पचना, दिन के सबसे बिजी शेड्यूल में एक्टिव रहना, जिस तरह के ट्रैवल की आदत हो वो पूरा करना सब कुछ शामिल है।

शरीर के कई हिस्से किसी घड़ी के पुर्जों की तरह काम करते हैं। हर हिस्से का अपना अलग काम और समय बताने में अपनी अलग पहल। जिन साइनटिस्ट को अभी नोबेल मिला है उन्होंने इस बायोलॉजिक क्लॉक में सिरकार्डियन रिथम (एक ऐसा प्रोसेस जो बॉडी में हर 24 घंटे में होता है) में आणविक बदलावों को समझाया।

क्या हुआ इनकी खोज से

इनकी इस खोज से एक अहम कारण समझ में आया कि आखिर क्यों इंसानी शरीर को सोने की जरूरत होती है और ये होता कैसे है। कैसे किसी भी इंसान को नींद आती है और क्यों बायोलॉजिकल क्लॉक का बिगड़ना नींद न आने का और बाकी समस्याओं का कारण बन सकता है।

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बायोलॉजिकल क्लॉक पर निर्भर करना है हमारा दिन

इन तीनों वैज्ञानिकों ने ‘सर्केडियन रिदम’ की अवधारणा दी है जिसके अनुसार धरती पर जीवन हमारे ग्रह के परिक्रमा के अनुरूप होता है। जीवों का  बायोलॉजिकल क्लॉक, सर्केडियन रिदम के सहारे अपने आप को पृथ्वी की परिक्रमा के अनुरूप खुद को ढाल लेता है। नोबल असेंबली ने बताया कि इन तीनों वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया की आंतरिक कार्यप्रणाली का करीब से अध्ययन किया है। इंटरनल बायोलॉजिकल क्लॉक हॉर्मोन्स लेवल्स, नींद, शरीर के तामपान और मेटाबोलिजम जैसे जैविक कार्यों को प्रभावित करता है। यही वजह है कि जब हम अपने टाइम जोन को बदलते हैं तो हमारा इंटरनल क्लॉक, बाहरी वातावरण से तुरंत तालमेल नहीं बिठा पाता।

इन तीनों चिकित्सा वैज्ञानिकों को कुल 9 लाख स्विडिश क्रोनोर (11 लाख अमेरिकी डॉलर या करीब 7 करोड़ रुपये) की प्राइज मनी मिलेगी। पिछले साल जापान के योशिनोरी ओशुमी को चिकित्सा का नोबेल मिला था।

बायोलॉजिकल क्लॉक (सरकेडियन क्लॉक) की गुत्थी सुलझाने वाले तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों को वर्ष 2017 का चिकित्सा का नोबेल (मेडिसिन) देने की घोषणा की गई है। सोने और जागने के चक्र को नियंत्रित करने के तौर-तरीकों का पता लगाने वाले जेफ्री हॉल, माइकल रॉसबैश और माइकल यंग को पुरस्कार के तौर पर 11 लाख डॉलर (7.20 करोड़ रुपये) नकद और प्रतीक चिह्न दिए जाएंगे। जैविक तौर पर कैसे खुद को उसके अनुकूल ढालते हैं।’ वैज्ञानिकों ने बहुत पहले सभी सजीव में प्राकृतिक तौर पर टाइमकीपर होने की बात कही थी, जो पृथ्वी की लय का पूर्वानुमान लगाने और उनके प्रति अनुकूलन में मदद करता है।

भविष्य में करेगा मदद

भविष्य में इसकी मदद से कई तरह की बीमारियों का इलाज भी किया जा सकेगा। निर्धारित प्राकृतिक चक्र (जैसे रात में जागना और दिन में सोना) के मुताबिक नहीं रहने की स्थिति में कई तरह की समस्याएं सामने आती हैं। शोधकर्ताओं ने बायोलॉजिक क्लॉक की आंतरिक कार्यप्रणाली को पहली बार सामने लाया है। हवाई यात्रा के दौरान टाइम जोन बदलने के कारण जेटलैग (नींद में अस्थायी दिक्कत) जैसी समस्या सामने आती है। बायोलॉजिकल क्लॉक में गड़बड़ी के कारण डिप्रेशन, न्यूरोलॉजिकल गड़बड़ी, बाईपोलर डिसऑर्डर (दिमाग से जुड़ी समस्या) और मस्तिष्क से जुड़ी अन्य समस्याएं होती हैं।

 

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