संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट के ज़रिये भारत को लगा एक और गंभीर झटका

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संयुक्त राष्ट्र

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के ज़रिए भारत को एक गंभीर समस्या के समाधाम के बारे में फिर से विचार करने की ज़रूरत पड़ेगी। संयुक्त राष्ट्र ने भारत को आईना दिखाते हुए कहा है कि आज भी भारत में बाल मृत्युदर की हालत गंभीर बनी हुई है, अब हर दिन लगभग 7,000 बच्चों की मृत्यु हो जाती है।

दुनिया भर में पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर में कमी के बावजूद बच्चों के जन्म के दिन मृत्यु का आंकड़ा कम नहीं हो रहा तथा इसे कम करने के लिए और अधिक उपाय किये जाने की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों की कल जारी रिपोर्ट के मुताबिक पांच वर्ष से कम उम्र में मरने वाले बच्चों की संख्या वर्ष 2000 के लगभग 99 लाख की तुलना में 2016 में अब तक के सबसे निचले स्तर 56 लाख रह गयी है लेकिन इस अवधि के दौरान नवजात शिशुओं की मृत्यु का अनुपात 41 से बढ़कर 46 प्रतिशत यानी 7,000 बच्चे प्रतिदिन हो गया।

infant mortality rate increase
भारत में बाल मृत्युदर की हालत गंभीर

बाल मृत्युदर का स्तर और रुझान नाम से इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक ने प्रकाशित किया है। इसके मुताबिक 2016 में पांच साल से छोटे 56 लाख बच्चों की मौत हुई. यह अब तक का सबसे कम आंकड़ा होने बावजूद 2016 में रोजाना 15 हजार बच्चों ने दम तोड़ा। हालांकि, पांच साल से छोटे दुनिया के एक-तिहाई बच्चों की मौतें भारत और नाइजीरिया में हुईं. दुनिया में पांच साल से कम आयु के बच्चों की 24 फीसदी मौतों के लिए निमोनिया और डायरिया जिम्मेदार थे संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र ने मौजूदा रुझानों के आधार पर 2017 से 2030 के बीच दुनिया में तीन करोड़ नवजात शिशुओं की मौत का अनुमान पेश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से 80 फीसदी मौतें दक्षिणी एशिया और उप-सहारीय अफ्रीकी देशों में होंगी। इस चुनौती को देखते हुए यूनिसेफ में स्वास्थ्य प्रमुख स्टेफन स्वार्टलिंग पीटरसन ने कहा है कि जब तक बच्चों को उनके जन्म के दिन और उसके बाद के दिनों मरने से बचाने के लिए कदम नहीं उठाया जाता है, सारी प्रगति अधूरी बनी रहेगी। उनका यह भी कहना था कि बच्चों को जिंदा रखने के लिए ज्ञान और तकनीक उपलब्ध है, बस उन्हें आवश्यकता वाली जगहों पर पहुंचाने की जरूरत है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

  • दुनिया में बीते साल नवजात शिशुओं की मौत के कुल मामलों में भारत का हिस्सा 24 फीसदी था. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में नवजात शिशुओं की मौत के 77 फीसदी मामले दक्षिणी एशिया और उप-सहारीय अफ्रीकी देशों में सामने आए।
  • दुनिया में नवजात शिशुओं की कुल मौतों के आधे मामले भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, कांगो और इथियोपिया में दर्ज किए गए।
  • दुनिया में नवजात शिशुओं की कुल मौतों में भारत के 24 फीसदी, पाकिस्तान के 10 फीसदी, नाइजीरिया में नौ फीसदी, कांगो में चार और इथियोपिया में तीन फीसदी मामले शामिल थे। यहां नवजात शिशुओं का मतलब जन्म से लेकर 28 दिन तक के बच्चों से है।

    infant mortality rate increase
    बाल मृत्युदर की हालत गंभीर
  • बाल मृत्युदर का स्तर और रुझान’ नाम से इस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ), विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक ने प्रकाशित किया है। इसके मुताबिक 2016 में पांच साल से छोटे 56 लाख बच्चों की मौत हुई।
  • यह अब तक का सबसे कम आंकड़ा होने बावजूद 2016 में रोजाना 15 हजार बच्चों ने दम तोड़ा। हालांकि, पांच साल से छोटे दुनिया के एक-तिहाई बच्चों की मौतें भारत और नाइजीरिया में हुईं। दुनिया में पांच साल से कम आयु के बच्चों की 24 फीसदी मौतों के लिए निमोनिया और डायरिया जिम्मेदार थे।
  • संयुक्त राष्ट्र ने मौजूदा रुझानों के आधार पर 2017 से 2030 के बीच दुनिया में तीन करोड़ नवजात शिशुओं की मौत का अनुमान पेश किया है। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से 80 फीसदी मौतें दक्षिणी एशिया और उप-सहारीय अफ्रीकी देशों में होंगी।

जब तक बच्चों को उनके जन्म के दिन और उसके बाद के दिनों मरने से बचाने के लिए कदम नहीं उठाया जाता है, सारी प्रगति अधूरी बनी रहेगी। बच्चों को जिंदा रखने के लिए ज्ञान और तकनीक उपलब्ध है, बस उन्हें आवश्यकता वाली जगहों पर पहुंचाने की जरूरत है।

 

 

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