जानिए आखिर कैसी स्थिति है भारत में पैरालिंपिक खेलों की.

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पैरालिम्पिक खेल

खेल की बात की जाए तो पैरालिंपिक खेलों का उसमे ज़िकर न करें ऐसा हो नहीं सकता. इन खेलों ने आजकल हर जगह अपनी काबिलियत के बारे में पुरे विश्व को बता दिया है कि इन खेलों को भी अलग न समझें. भारत में पैरालिंपिक खेलों के बारे में सुनने को बहुत मिल रहा है और क्यों न मिले क्योंकि पिछली बार के पैरालिंपिक खेलों में भारत ने चार पदक जीते थे जिनमे से भारत ने 2 गोल्ड, 1 सिल्वर और 1 ब्रोंज मैडल अपने नाम किया था| भारत का ये अभी तक का सबसे बढ़िया प्रदर्शन था।

पदक पाने वालों के नाम मरियप्पन थंगावेलु ,देवेंद्र झाझरिआ ,दीपा मालिक ,वरुण सिंह भाटी थे। इन चारों ने भारत का नाम सच में बहुत रोशन करवाया और भारत सरकार ने इन्हे अनेक पुरस्कारों से भी नवाज़ा।

आइए जानते हैं इन खिलाडियों के बारे में

दीपा मालिक-दीपा मलिक ,शॉटपुट एवं जेवलिन थ्रो के साथ-साथ तैराकी एवं मोटर रेसलिंग से जुड़ी एक विकलांग भारतीय खिलाड़ी हैं जिन्होंने 2016 पैरालंपिक में शॉटपुट में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा। 30 की उम्र में तीन ट्यूमर सर्जरीज और शरीर का निचला हिस्सा सुन्न हो जाने के बावजूद उन्होने न केवल शॉटपुट एवं ज्वलीन थ्रो में राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक जीते हैं, बल्कि तैराकी एवं मोटर रेसलिंग में भी कई स्पर्धाओं में हिस्सा लिया है। उन्होने भारत की राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 33 स्वर्ण तथा 4 रजत पदक प्राप्त किये हैं। वे भारत की एक ऐसी पहली महिला है जिसे हिमालय कार रैली में आमंत्रित किया गया। वर्ष 2008 तथा 2009 में उन्होने यमुना नदी में तैराकी तथा स्पेशल बाइक सवारी में भाग लेकर दो बार लिम्का बूक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराया। यही नहीं, सन् 2007 में उन्होने ताइवान तथा 2008 में बर्लिन में जवेलिन थ्रो तथा तैराकी में भाग लेकर रजत एवं कांस्य पदक प्राप्त किया। पैरालंपिक खेलों में उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों के कारण उन्हे भारत सरकार ने अर्जुन पुरस्कार प्रदान किया।

वरुण सिंह भाटी-वरुण सिंह भाटी ग्रेटर नोएडा के जमालपुर गांव के रहने वाले हैं। जब बहुत छोटे थे तभी पोलियो के कारण उनका एक पैर खराब हो गया था। इसके बावजूद भाटी ने हिम्मत नहीं हारी। 21 साल के भाटी ने 2014 के इंचियोन पैरा-एशियाई खेलों में पांचवां स्थान हासिल किया। उसी साल चीन ओपन एथलेटिक्स चैपियनशिप में भी इन्होंने गोल्ड मेडल पर कब्जा जमायावरुण सिंह भाटी एक भारतीय पैरालंपिक खिलाड़ी हैं जिन्होंने 2016 रियो पैरालंपिक में कांस्य पदक जीता है।

देवेंद्र झाझरिआ-देवेन्द्र एक भारतीय पैरालंपिक खिलाड़ी है. ये पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पैरालिंपियन है। 2004 पैरालंपिक एथेंस में उन्होंने पहला स्वर्ण पदक जीता था रियो डी जनेरियो, 2016 ग्रीष्मकालीन पैरालंपिक खेल में, उन्होंने अपने पहले रिकॉर्ड को बेहतर बनाते हुए, एक ही आयोजन में दूसरा स्वर्ण पदक जीता। देवेन्द्र को फिलहाल पैरा चैंपियंस कार्यक्रम के माध्यम से गो एसपोर्ट फाउंडेशन द्वारा समर्थित किया जा रहा है।2002 में देवेंद्र झाझड़िया ने दक्षिण कोरिया में FESPIC खेलों में पहला स्वर्ण पदक जीता था। जबकि 2003 में इन्होंने एथेंस में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले अपने पहले पैरालम्पिक खेलों के लिए अर्हता प्राप्त की। खेल में उन्होंने 62 .94 मीटर की दूरी के साथ एक नया विश्व रिकॉर्ड बना दिया था। इसके अलावा सफलताएं ल्योन, फ्रांस में भारतीय दंड संहिता एथलेटिक्स विश्व चैंपियनशिप में 2013 में आया, जब उन्होंने एफ 46 भाला फेंक स्वर्ण पदक जीता था। इसके बाद दक्षिण कोरिया में इंचियॉन में 2014 एशियाई पैरा खेलों में रजत पदक जीता।

मरियप्पन थंगावेलु-बचपन में मारियप्पन को वॉलीबॉल खेलना अच्छा लगता था और अपने एक पैर के खराब हो जाने के बावजूद वे इसे खेलते रहे। एक बार इनके शिक्षक ने कहा कि वे ऊंची कूद में हाथ क्यों नहीं आजमाते। मारियप्पन को बात जंच गई और 14 साल की उम्र में इन्होंने पहली बार ऊंची कूद की प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लिया, वो भी सामान्य एथलीटों के खिलाफ। उस प्रतिस्पर्धा में वे दूसरे स्थान पर रहे।2016 में मरियप्पन के चयन पैरालम्पिक खेलों की भारतीय टीम में हो गया।मरियप्पन थंगावेलु इस स्पर्धा में कांस्य पदक ही जीत पाए। केंद्र सरकार ने मरियप्पन को 75 लाख रुपये दिए, वहीं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री श्रीमती जयललिता ने उन्हें बतौर पुरस्कार 2 करोड़ रुपये देने की घोषणा की।

 

 

paralympic stars
मरियप्पन थंगावेलु ,देवेंद्र झाझरिआ ,दीपा मालिक ,वरुण सिंह भाटी सचिन के साथ

जानिये कैसी सुविधाएं दी जा रही है देश के पैरालिंपिक खिलाडियों को ?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार देश में पैरालिंपिक खेलों को सरकार बढ़ावा नहीं दे रही और जो सुविधाएं इन खिलाडियों को मिलनी चाहिए वो भारत सरकार नहीं दे पा रही। रिपोर्ट के अनुसार मालूम पड़ा कि खिलाडियों को बेकार टॉयलेट , बिजली का ना होना , बेकार खाना आदि सब बेकार चीज़ें दी जा रही हैं जिससे हमारे सारे खिलाड़ी परेशान है और अगर ये ही हाल चलता रहा तो भारत में पैरालिंपिक खेल बंद हो जाएंगे।

इस रिपोर्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आखिर इन खेलों को ज्यादा महत्त्व क्यों नहीं दिया जा रहा है ?

इन खेलों को ज्यादा महत्वता इसलिए नहीं दी जा रही क्योंकि इस में ज्यादा खिलाड़ी नहीं हैं और लोग भी इन खेलों को कम जानते हैं। जिससे सरकार भी इन खेलों में ज्यादा पैसा नहीं लगा रही। अगर बात करें क्रिकेट की तो क्रिकेट की लोकप्रियता जितनी है उतनी किसी खेल की नहीं। सबसे ज्यादा भारत में क्रिकेट लोकप्रिय है अगर क्रिकेट जितनी लोकप्रियता पैरालिंपिक खिलाडियों को भी मिल जाए तो देश में पैरालिंपिक खेलों को एक नयी दिशा ज़रूर मिलेगी।

पैरालिम्पिक क्यों है दूसरे खेलों से अलग 

पैरालिंपिक खेलों में जितने भी खिलाड़ी होते है वो असल में अपाहिज होते हैं और उनकी खेल की तरफ रूचि को देखकर पैरालिंपिक खेलों का आयोजन किया जाता है। जिसमें अनेक देश के खिलाड़ी भाग लेते है। पैरालिंपिक खेल ओलिंपिक खेलों के बाद आयोजित होते हैं। जिसमे दुनिया भर के अपाहिज खिलाड़ी भाग लेने आते हैं और सबको टक्कर देते हैं।

पैरालिंपिक खेलों को आजकल हर जगह बढ़ावा दिया जा रहा है और अगर आम नागरिक इन खेलों के बारे में अपाहिज लोगों को बताये तो शायद कुछ खिलाड़ी जो अपने सपनों को पूरा होते हुए देखना चाहते हैं इन खेलों के द्वारा पूरा कर सकते हैं क्योंकि ये खेल बने ही उनके लिए हैं।

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