मानवता और धर्म, कौन है आगे ?

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situation of kurds
कुर्दों के हालात गंभीर

आज केवल रोहिंगा मुसलमान ही नही बल्कि कई ऐसी सताई हुई आबादियाँ है जिन्होंने ना केवल विश्व के क्रूर बर्ताव को भी सहा बल्कि उनके खिलाफ़ एकजुट होकर आज भी लड़ रहें है।

दजला अरब भूखंड की सबसे बड़ी नदी है। यह तुर्की से बहकर सीरिया और इराक में गिरती है। इन तीनों देशों में पानी का समझौता है। यदि इसमें अवरोध पैदा हो जाए तो तीनों देशों के बीच युद्ध छिड़ सकता है। सीरिया और इराक की एकता का बड़ा कारण यह नदी ही है। इराक में किसी की भी सत्ता हो उसे सुन्नी बहुल तुर्की और सीरिया की भावनाओं का आदर करना पड़ता है। यह वही नदी ही है जिसके किनारे प्राचीन बेबीलोन और नेनवा की सभ्यता पली है, जिसे इतिहास में “मेसोपोटामिया की सभ्यता” कहा जाता है।

बाइबिल मेंदजला को स्वर्ग से उतरी नदी माना जाता है। इसके किनारे न केवल बगदाद, नेनवा और अशूर जैसे ऐतिहासिक नगर बसे हुए हैं बल्कि फुरात के किनारे ही करबला नामक नगर बसा हुआ है जो इमाम हुसैन के रोजे के लिए विश्वविख्यात है। अपने 72 साथियों के साथ इमाम हुसैन ने यहां शहादत दी थी। करबला शियाओं का सबसे बड़ा तीर्थ है। इराक में अब तक सुन्नियों की सरकारें ही रही हैं लेकिन वे यहां के शियाओं की अवहेलना नहीं कर सकी हैं, क्योंकि उनकी आबादी सुन्नियों से अधिक है। लेकिन शिया भी सुन्नियों से बैर नहीं रख सकते क्योंकि तुर्की और सीरिया यदि दजला में पानी न छोड़ें तो इराक में त्राहि-त्राहि मच जाए।

सद्दाम का पतन हुआ। अमरीका की छत्रछाया में वहां चुनाव हुए जिसमें शिया अधिक संख्या में चुनकर आए। अपने देश पर यहां के सुन्नी, शियाओं का वर्चस्व किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करना चाहते। जैसे तैसे स्थति में सुधार हो उससे पहले ही ISIS आतंकवादी समूह ने इस्लाम को आगे बढानें का दायित्व अपने कंधो पर लिया, जिसने आज तक के मानवता के इतिहास को शर्मसार कर दिया| वो भी धर्म के नाम पर।फिर शुरू होता है एक और खूनी खेल, इस बार बन्दूक की नोंख पर थे, समाज के सबसे कमज़ोर वर्ग जिन्हें आसानी से निशाना बनाया जा सकता था| इनमे सबसे भयानक रूप से शोषण हुआ यज़ीदी या येज़ीदी।

यज़ीदी या येज़ीदी कौन है?

कुर्द कट्टर सुन्नी मुसलमान, योद्धा, कुशल घुड़सवार, बंजारा जाति के लोग हैं। यह कुर्दी(मुसलमानों का) लोगों का एक उपसमुदाय हैजि नका अपना अलग यज़ीदी है। इस धर्म में वह पारसी धर्म के बहुत से तत्व, इस्लामी सूफ़ी मान्यताओं और कुछ ईसाई विश्वासों के मिश्रण को मानते हैं। इस धर्म की शुरुआत १२वीं सदी ईसवी में शेख़ अदी इब्न मुसाफ़िर ने की और इसके अनुसार ईश्वर ने दुनिया का सृजन करने के बाद इसके देख-रेख सात फरिश्तों के सुपुर्द करी जिनमें से प्रमुख को ‘मेलेक ताऊस’, यानि ‘मोर (पक्षी) फ़रिश्ता’ है। अधिकतर यज़ीदी लोग पश्चिमोत्तरी इराक़ के नीनवा प्रान्त में बसते हैं, विशेषकर इसके सिंजार क्षेत्र में। इसके अलावा यज़ीदी समुदाय दक्षिणी कॉकस, आर्मेनिया, तुर्की और सीरिया में भी मिलते है।

जैसे जैसे ISIS (इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़ एंड सीरिया)के आतंकवादीयों ने अपने पाँव पसारे वैसे वैसे ही यज़ीदीयों पर अपना मूल धर्म यज़ीदी धर्म को छोड़ने को दवाब बढता गया, साथ ही अत्याचारों की मानवीयता की सारी हदों को पार कर लिया गया| सबसे ज्यादा शोषण बच्चों और महिलाओं का किया गया।

कई बार यज़ीदीयों को अपने गाँव को छोड़कर जाना पड़ा, आतंकी संगठन इस्‍लामिक स्‍टेट के जुल्‍म और उसके खौफ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक 17 साल की यजीदी लड़की यास्‍मीन ने इन दुर्दांत आतंकियों के चंगुल में दोबारा फंसने के खौफ से ही खुद को जला लिया। दरअसल कुछ समय पहले इस लड़की को आईएस के चंगुल से छुड़ाया गया था। आतंकी लड़ाकों ने इसका यौन शोषण किया था। वीभत्सता की परिभाषा पूछने आपको कहीं नहीं जाना पड़ेगा, अगर आप टेलीग्राम ऐप पर दिए इस विज्ञापन को पढ़ेंगे – ‘कुंवारी है. खूबसूरत है. 12 साल की है… उसकी कीमत 12,500 अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुकी है, और वह जल्द ही बिक जाएगी…ऐसे विज्ञापनों को ISIS(इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़ एंड सीरिया) द्वारा प्रसारितं किया गया।

इसमें अरबी भाषा में लिखा गया यह विज्ञापन बिल्लियों, हथियारों और अन्य रणनीतिक सामान बेचने के लिए दिए गए विज्ञापनों के साथ नज़र आया, जो समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस को अल्पसंख्यक यज़ीदी समुदाय के एक ऐसे कार्यकर्ता ने उपलब्ध करवाया, जिसकी पत्नी तथा बच्चों को आतंकवादियों ने सेक्स स्लेव के तौर पर कैद कर रखा है।

kurd suiation
यज़ीदीयों हालात बदले

पर फिर यज़ीदीयों हालात बदले…

ये सब चल ही रहा था तभी यूपोपियन देशों को आतंकवादी घटनाओं का सामना करना पड़ा। आपको बता दे कि “यूरोपीय जनता ने कभी भी आतंकवादी घटनाओं उतने करीब से नही देखा था, जितने करीब से भारत जैसे विकासशील देश देख चुके थे”। अतः अब विकसित देश सोचने को मजबूर हुए कि, कही अगला निशाना हम ही तो नही है? खासकर यह प्रश्न अमेरिका के सामने था, क्योकि अब वह किसी भी सूरत में दूसरा वर्ल्ड ट्रेड सेण्टर जैसा आतंकी हमला दुबारा नही झेल सकते थे।

अमेरिका ने अब ISIS(इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़ एंड सीरिया) के खिलाफ़ कड़े कदम उठाने की सोची इसके लिए अमेरिका ने यज़ीदीयों को इराक़ी सेना के साथ मिलकर, ISIS(इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़ एंड सीरिया) के खिलाफ युद्ध लड़ने का प्रशिक्षण देना शुरू किया।  कई मोर्चो पर कुर्द लड़ाको को सफ़लता भी मिली है पर अभी भी संघर्ष जारी है।

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isis के खिलाफ़ लड़ती कुर्द महिला

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि, यह लड़ाई अब भी जारी है। एक तरफ अपनें अस्तित्वहीन पहचान को यज़ीदी ढूँढने में लगे हुए है वही दूसरी ओर ISIS(इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक़ एंड सीरिया) की तरह कई और ऐसे आतंकी संगठन अपना सर ऊंचा करने में लगे हुए है।

सवाल यह है की हम कब तक धर्म के नाम पर गुमराह रहेगे? ऐसे संवेदनशील मामलो को हमें राजनितिक अंतर्राष्ट्रीयकरण करने से बचना होगा साथ ही अकेले नही एकजुट होकर ऐसी समस्याओं से लड़ना होगा ताकि मानवता बचीं रहें।

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