महिलाओं के कानूनी अधिकार जो हर महिला को पता होना चाहिए

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महिलाओं के लिए बहुत ज़रूरी है कि उन्हे कानूनी प्रावधानों का पता हो ताकि वो अपने अधिकारों को लेकर सजग हो।

महिलाएं हमारे समाज में आज भी अक्सर भेदभाव का शिकार होती हैं। भारत में महिलाओं के प्रति कानूनों की कोई कमी नहीं है। लेकिन फिर भी अपराधों में कमी नहीं आई है। फिर चाहे वो एसिड अटैक हो, दहेज हत्या, प्रताड़ना, छेड़छाड़, पीछा करना, या घरेलू हिंसा।

नैश्नल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों की मानें तो तकरीबन देश में 100 महिलाएं रोज़ बलात्कार और कई छेड़छाड़ का शिकार होती हैं।

लेकिन कई मामलों में लड़कियों को कानून की जानकारी नहीं होती और वह चुप बैठ जाती हैं। उन्हे लगता है कि कोर्ट के चक्कर काटने पड़ेंगे या पुलिस उन्हे कभी भी रात में थाने बुला सकते हैं। उनमें ख़ौफ़ होता है कि अगर उन्होने आवाज़ उठाई तो सबके सामने उनसे अजीबोगरीब सवाल पूछे जाएँगे।
लेकिन यह सब गलत है, इसलिए महिलाओं के लिए बहुत ज़रूरी है कि उन्हे कानूनी प्रावधानों का पता हो ताकि वो अपने अधिकारों को लेकर सजग हो।

जाने ऐसे कई कानूनों व नियमों के बारे में, जिन्हे जानना महिलाओं के लिए अत्यधिक ज़रूरी है-
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महिलाओं को अपनी स्थिति के बारे में जागरुक होना चाहिए।
  • छेड़खानी-

धारा 509 के तह्त सार्वजनिक या अकेले में महिला के साथ किसी भी रूप में छेड़खानी (मौखिक, शारीरिक या सांकेतिक) अपराध है। इसके अंतर्गत अपराधी को 3 साल जेल की सज़ा और जुर्माने का भी प्रावधान है।

  • घरेलू हिंसा

महिला के खिलाफ घर में पति या ससुरालियों द्वारा हिंसा घरेलू हिंसा के तह्त अपराध है। घरेलू हिंसा कानून, 2005 की धारा 498 के अंतर्गत मारपीट, रेप, जबरन यौन संबंध बनाना अपराध है और इसके तह्त 1 साल की सज़ा और जुर्माने का प्रवाधान है।

  • साइबर क्राइम

महिलाओं को ट्रोल, बुलिंग या एब्युस करना या पोर्नग्राफी के ज़रिए परेशान करना अपराध है। आईटी एक्ट, 2000 के तह्त इस अपराध के लिए 3 साल जेल से लेकर आजीवन कारावास और जुर्माने का प्रावधान है।

  • दहेज प्रताड़ना

दwहेज के लिए पति या ससुराल पक्ष के किसी दूसरे शख्स के उत्पीड़न से महिला को बचाने के लिए 1986 में आईपीसी में सेक्शन 498-ए (दहेज कानून) शामिल किया गया। अगर महिला को दहेज के लिए शारीरिक, मानसिक, आर्थिक या भावनात्मक रूप से परेशान किया जाता है तो वह दहेज कानून के तहत केस दर्ज करा सकती है।

  • एसिड अटैक

सरकार ने बिना सही सूचना के एसिड की बिक्री पर रोक लगा दी है, लेकिन अब भी लड़कियों पर हमले के मामलों में रोक नहीं लग पा रही है।
धारा 326ए और 326बी के तह्त एसिड फेंकने वाले अपराधी को जुर्माने के साथ 7 साल से लेकर आजीवन कारावास की सज़ा का प्रावधान है।

  • बलात्कार

इस अपराध को कानून की कई धाराओं में वर्गीकृत किया गया है। धारा 376 के तह्त नाबालिग लड़की या महिला से रेप, धारा 376ए रेप और हत्या, परिवारजन या नौकर द्वारा रेप धारा 376सी के तह्त और गैंगरेप धारा 376डी के तह्त संगीन अपराध माना गया है।

यहां तक की धारा 376बी के तह्त मैरिटल रेप को भी अपराध माना गया है। इन अपराधों में सज़ा अपराध की संगीनता के हिसाब से अलग-अलग रेंज में जुर्माने के साथ 7 साल से लेकर 20 साल तक या फिर उम्र कैद तक रखी गई है।

  • धारा-354
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धारा 354 के चार पार्ट हैं।

इसका इस्तेमाल ऐसे मामलों में किया जाता है जहाँ महिला की मर्यादा और मान सम्मान को क्षति पहुँचाने के लिए, उस पर हमला किया गया हो या उसके साथ गलत मंशा के साथ ज़बरदस्ती की गई हो।

भारतीय दंड संहिता के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति किसी महिला की मर्यादा को भंग करने के लिए उस पर हमला या ज़बरदस्ती करता है, तो उस पर आईपीसी की धारा 354 लगाई जाती है। जिसके तहत आरोपी पर दोष सिद्ध हो जाने पर दो साल तक की कैद या जुर्माना या फिर दोनों की सज़ा हो सकती है।

धारा 354 एक के चार पार्ट हैं। इसके तहत कानूनी व्याख्या की गई है कि अगर कोई शख्स किसी महिला के साथ सेक्सुआल नेचर का फ़िज़िकल टच करता है या फिर ऐसा कंडक्ट दिखाता है जो सेक्सुअल कलर लिया हुआ हो तो 354 ए पार्ट 1 लगेगा। वहीं सेक्सुअल डिमांड करने पर पार्ट 2, मर्ज़ी के खिलाफ पोर्न दिखाने पर पार्ट 3 और सेक्सुअल कलर वाले कंमेंट पर पार्ट 4 लगता है। 354 ए के पार्ट 4 में एक साल तक कैद जबकि बाकी तीनों पार्ट में 3 साल तक कैद की सज़ा का प्रावधान है।

  • महिला हेल्पलाइन नंबर 181 (24*7 घंटे)

दिल्ली महिला आयोग के विमन हेल्पलाइन नंबर 181 पर आप अपनी शिकायत दर्ज कर सकती हैं।

महिलाओं के अन्य ज़रूरी अधिकार:-

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हमे कानूनों और अधिकारों के बारे में जरूर पता होना चाहिए वरना शोषण हो सकता है ।
  • नाम न छापने का अधिकार-

यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को नाम न छापने देने का अधिकार है। अपनी गोपनीयता की रक्षा करने के लिए उत्पीड़न की शिकार हुई महिला अकेले अपना बयान किसी महिला पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में या फिर जिलाधिकारी के सामने दर्ज करा सकती है।

  • रात में गिरफ़्तार न होने का अधिकार-

एक महिला को सूरज डूबने के बाद और सूरज उगने से पहले गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता। किसी खास मामले में एक प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही ये संभव है।

  • गरिमा को अधिकार-

किसी मामले में अगर आरोपी एक महिला है, तो उसपर की जाने वाली कोई भी चिकित्सा जाँच प्रक्रिया किसी महिला द्वारा या किसी दूसरी महिला की उपस्थिति में ही की जानी चाहिए।

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