भारत-जापान की बढ़ती करीबी बनाम ड्रैगन

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भारत-जापान कि बढ़ती करीबी बनाम ड्रैगन

भारत और जापान के सम्बन्ध हमेशा से काफ़ी मजबूत और स्थिर रहे हैं। जापान की संस्कृति पर भारत में जन्मे बौद्ध धर्म का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। भारत के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान भी जापान की शाही सेना ने सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज को सहायता प्रदान की थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद से भी अब तक दोनों देशों के बीच मधुर सम्बन्ध रहे हैं। भारत की ओर से भी चीन के साथ रिश्तों और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में जापान को काफ़ी महत्व दिया गया है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार की पूर्व की ओर देखो नीति ने भारत को जापान के साथ मधुर और पहले से बेहतर सम्बन्ध बनाने की ओर प्रेरित किया है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर किसी द्विपक्षीय विदेश यात्रा के लिए सर्वप्रथम जापान को चुना|

डोकलाम सीमा पर 73 दिनों तक भारत और चीन के बीच चली तनातनी के समाप्त होने के बाद जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे के भारत दौरे को काफ़ी अहम माना जा रहा है। जापानी मीडिया का कहना है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा पर अहम समझौते हो सकते हैं। जापान के राष्ट्रीय अख़बार द मइनिची ने लिखा है कि क्षेत्रीय समुद्रो में चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच दोनों देश कई सुरक्षा समझौतों पर सहमति बना सकते हैं। मइनिची ने लिखा है, शिंज़ो अबे ने टोक्यो छोड़ने से पहले कहा कि वह चिनकनसेन प्रोजेक्ट में बड़ा क़दम उठाना चाहते हैं।  यह भारत और जापान दोनों की आर्थिक प्रगति के लिए अग्रदूत साबित होगा।  द मइनिची आगे लिखा कि, ”पूर्वी और दक्षिणी चीनी सागर के साथ हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच शिंज़ो अबे भारत में सुरक्षा उपकरणों के साथ अमरीका, जापान और भारत के बीच साझा सैन्य अभ्यास पर बात कर सकते हैं और जापानी सरकार ने भी इस बात की पुष्टि की है

जापानी सरकार के सूत्रों ने मंगलवार को क्योडो न्यूज़ से कहा कि मोदी की इस बात से जापानी पीएम अबे सहमत हैं कि टू-प्लस-टू सिक्यॉरिटी टॉक को बेहतर किया जाना चाहिए। इसके तहत चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच संवाद को और सक्रिय बनाया जाना है। मोदी के साथ शिंज़ो अबे उत्तर कोरिया के उकसावे पर भी बात कर सकते हैं। जापान टाइम्स ने भी इस बात की पुष्टि की है कि शिंज़ो अबे मोदी के “टू-प्लस-टू डायलॉग को लेकर सहमत हैं।

जापान टाइम्स ने एक डिप्लोमैटे के हवाले से लिखा है कि 2014 में जापान ने भी इस तरह का प्रस्ताव रखा था लेकिन अमल में नहीं आ पाया था क्योंकि भारत चीन को नाराज़ नहीं करना चाहता था। हाल के दिनों में जापान, भारत और अमरीका के बीच गहरे हुए सुरक्षा सहयोग के कारण जापान को लग रहा है कि अब इसे अमल में लाने का सही वक़्त है। अगस्त में भारत अमरीका से टु-प्लस-टु डयलॉग पर सहमत हो गया था और अब जापान भी इसका हिस्सा बनेगा। इसके तहत हिन्द महासागर में नियमित रूप से भारतीय और अमरीकी नेवी का वार्षिक मालबार नौसना अभ्यास किया जायेगा। यहाँ इस बात की सम्भावना है कि अबे परमाणु हथियार उपकरण और टेक्नलॉजी भारत को देने पर बातचीत कर सकते हैं। अभी दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर को लेकर सहमति हुई है।

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भारत जापान की बढ़ती मित्रता

भारत और जापान के बीच गहराते संबंधों को लेकर चीनी मीडिया भी हरकत में है जैसा कि ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने जापान के सामने एशिया-अफ़्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा है और इसके द्वारा दोनों देश वन बेल्ट वन रोड की काट ढूंढ रहे हैं और जापान भी मोदी के प्रस्ताव से समहत है। इसने लिखा है कि भारत और जापान नया समुद्री मार्ग बनाना चाहते हैं जिसके ज़रिए एशिया और प्रशांत महासागर के देशों को अफ़्रीका से जोड़ा जा सके। ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक भारत और जापान चीन का प्रभाव कम करने के लिए ऐसा करना चाह रहे हैं इसलिए चीन को इस प्रस्ताव के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। भारत और जापान अफ़्रीका में सक्रिय रूप से इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर निवेश करना चाहते हैं।

ऐसा कहा जा रहा है कि जापान भारत के साथ ईरान के चाबहार पोर्ट के विकास में शामिल हो सकता है। हाल के सालों में जापान और चीन के संबंध ठीक नहीं रहे हैं। दूसरी तरफ़ चीन और भारत के संबंध भी अच्छे नहीं हैं, इसी महीने दोनों देशों के बीच डोकलाम सीमा पर तनाव ख़त्म हुआ है। पिछले साल चीन ने भारत की एनएसजी सदस्यता का विरोध किया था तो दूसरी तरफ़ भारत ने दलाइ लामा को लेकर चीन की आपत्तियों को ख़ारिज कर दिया था। जापान और चीन के संबंध हमेशा से ख़राब रहे हैं, दूसरे विश्व युद्ध से पहले चीन को जापान से करारी मात खानी पड़ी थी जापान से मिली हार को चीन आज तक नहीं भूल पाया है चीन को इस युद्ध में व्यापक पैमाने पर नुक़सान हुआ था। इस तरह 1962 में भारत पर चीन ने आक्रमण किया था और भारत को हार का सामना करना पड़ा था। आज की तारीख़ में दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं। दोनों देश एक दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखते हैं परिस्थिति स्वरूप  ऐसे में जापान और भारत स्वाभाविक रूप से दोस्त बन जाते हैं और चीन को चुनौती देते हुए अपने सम्बन्धो को आगे बढ़ा रहे हैं।

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