क्या 370 धारा ही है कश्मीर विवाद की असली वजह?

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एक्सपर्ट्स का मानना है कि धारा 370 ही है कश्मीर विवाद की जड़

कश्मीर हमेशा से ही भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद की वजह रहा है। कश्मीर पर अधिकार को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच 1947 से जंग ज़ारी है। इस विवाद को लेकर पाकिस्तान ने भारत पर तीन बार हमला किया और तीनों बार मुँह की खाई।

क्या है विवाद-

अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन शासक महाराजा हरि सिंह ने अपनी रियासत को भारत में विलय के लिए विलय-पत्र पर दस्तख़त किए थे। उस समय गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने 27 अक्टूबर को इसे मंजूरी दी। विलय-पत्र का खाका बिल्कुल वैसा ही था जैसा अन्य सैकड़ों रजवाड़ों ने अपनी-अपनी रियासत को भारत में शामिल करने के लिए उपयोग किया था। न इसमें कोई शर्त शामिल थी और न ही रियासत के लिए विशेष दर्जे जैसी कोई मांग थी। इस दस्तावेज़ पर दस्तख़त होते ही पूरा जम्मू और कश्मीर, जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े वाला इलाका भी शामिल है, भारत का अभिन्न अंग बन गया।

क्या है धारा 370-

Article 370
धारा 370 के तहत कश्मीर को विशेष दर्जा प्राप्त है

370 भारतीय संविधान का एक विशेष अनुच्छेद (धारा) है जिसके द्वारा जम्मू एवं कश्मीर राज्य को सम्पूर्ण भारत में अन्य राज्यों से ज़्यादा विशेष अधिकार प्राप्त है। इसके प्रावधानों को शेख़ अब्दुला ने तैयार किया था। सरदार पटेल को अंधेरे में रखकर नेहरूजी ने धारा-370 का मसौदा पहले से ही तैयार करवा लिया था।

भारतीय जनता पार्टी एवं कई राष्ट्रवादी दलो, इसे (धारा 370) जम्मू एवं कश्मीर में फ़ैले अलगाववाद के लिये ज़िम्मेदार मानते हैं और इसे समाप्त करने की माँग करते हैं। भारतीय संविधान में धारा 370 जवाहरलाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से तैयार किया गया था। स्वतन्त्र भारत के लिये कश्मीर का मुद्दा आज भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है।

क्या है 370 के तहत विशेषाधिकार-

370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से संबंधित क़ानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का मंजूरी चाहिये।

  • इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती।
  • इस कारण राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्ख़ास्त करने का हक़ नहीं है।
  • 1976 का शहरी भूमि क़ानून जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता।
  • भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि ख़रीदने का अधिकार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू-कश्मीर में ज़मीन नहीं ख़रीद सकते।

360 के तहत विशेष अधिकारों की सूची-

  • जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है।
  • जम्मू-कश्मीर का राष्ट्रध्वज अलग होता है।
  • जम्मू – कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्षों का होता है जबकि भारत के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।
  • जम्मू-कश्मीर के अन्दर भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं होता है।
  • भारत के उच्चतम न्यायालय के आदेश जम्मू-कश्मीर के अन्दर मान्य नहीं होते हैं।
  • भारत की संसद को जम्मू-कश्मीर के सम्बन्ध में अत्यन्त सीमित क्षेत्र में कानून बना सकती है।

धारा में समय के साथ हुए बदलाव-

370 में समय के साथ कई बदलाव भी किए गए। 1965 तक वहाँ राज्यपाल और मुख्यमंत्री नहीं होता था। उनकी जगह सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री हुआ करता था, जिसको बाद में बदला दिया गया। इसके अलावा,पहले जम्मू-कश्मीर में भारतीय नागरिक जाता था तो उसे अपने साथ पहचान-पत्र रखना ज़रूरी था, जिसका बाद में काफ़ी विरोध हुआ। विरोध होने के बाद इस प्रावधान को हटा दिया गया।

क्या यह दर्जा कभी ख़त्म हो सकता है –

बिना राज्य सरकार की सहमति के आर्टिकल 370 को ख़त्म करना केंद्र सरकार के लिए संभव नहीं है। अनुच्छेद 370 के उपबंध 3 में कहा गया है कि अगर राष्ट्रपति चाहें तो अधिसूचना जारी कर इस आर्टिकल को ख़त्म कर सकते हैं या उसमें बदलाव कर सकते हैं। लेकिन, ऐसा करने से पहले उन्हें राज्य सरकार से मंजूरी लेने की ज़रूरत होगी।

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