पूजा अर्चना की वज़ह से नही बल्क़ि किसी और वज़ह से सुर्ख़ियों में है यह मंदिर

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मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर भारत का 'स्वच्छ आयकॉनिक प्लेस'

भारत के मंदिर सदैव ही अपने प्राचीन इतिहास, कलाकृति और पूजा पद्यतियों के लिए प्रसिद्द रहें है। यह ना सिर्फ् जनसाधारण की आस्थाओं का प्रतीक है बल्क़ि हमारी संस्कृति के रक्षक भी। बता दे कि इन दिनों दक्षिण भारत का मदुरै में स्थित प्रसिद्ध मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर अपनीं स्वच्छता की वज़ह से सुर्ख़ियाँ बटोर रहा है।

मदुरै में प्रसिद्ध मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर को भारत में सबसे अच्छे ‘स्वच्छ आयकॉनिक प्लेस’ (स्वच्छ स्थान) का दर्जा दिया गया है। इस वर्ष की शुरुआत में ‘स्वच्छ प्रतीक स्थान’ की पहल के तहत केंद्र सरकार ने दस स्थानों की पहचान की थी। स्वच्छ भारत अभियान के तहत मदुरै सिटी कारपोरेशन को केंद्र से विशेष पुरस्कार प्राप्त करने की भी योजना है। जिला कलेक्टर वीरा राघव राव और निगम आयुक्त एस अनेश शेखर को 2 अक्टूबर को उमा भारती, केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री से पुरस्कार मिलेगा।

स्वच्छ Iconic प्लेस के रूप में मान्यता के हिस्से के रूप में श्री अनेश शेखर के अनुसार, मंदिर की परिधि को साफ करने के लिए एक परियोजना का अनुमान लगाया गया है। यह प्रारंभिक दौर में है और मार्च 2018 तक पूरा किया जाना है। इस परियोजना का अनुमान 11.65 करोड़ रुपये है और इसे भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड द्वारा अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) गतिविधि के तहत प्रायोजित किया गया है।

“हम अब तक तेजी से प्रगति के लिए सम्मानित किए गए हैं। हमें गर्व है कि हमें 10 प्रतिष्ठित स्थानों में चुना गया है।

 महत्वाकांक्षी लक्ष्य

  • पर्यटकों के उपयोग के लिए 25 ईशौचालय और 15 पानी एटीएम हैं। विशेष रूप से इस खंड को साफ करने के लिए दो सड़क सफाई कर्मचारी और बैटरी संचालित वाहन हैं।
  • आयुक्त के मुताबिक, मार्च 2018 से पहले का लक्ष्य चिथीराई, मासी, अवनी मूल मार्ग और वेल सड़कोंमंदिर के चारों समकक्ष चौराहों100% प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए होगा।

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    मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर भारत का ‘स्वच्छ आयकॉनिक प्लेस’
  1. तमिलनाडु के मुदरै सिटी कॉरपोरेशन को स्वच्छता अभियान को लेकर विशेष अवार्ड प्रदान किया जाएगा।
  2. यह पुरस्कार ‘स्वच्छ भारत अभियान  (स्वच्छ भारत मिशन) के एक हिस्से के रूप में केंद्र सरकार द्वारा दिया गया
  3. मंदिर प्रशासन के मुताबिक मार्च 2018 तक मंदिर परिसर पूरी तरह से प्लास्टिक मुक्त हो जाएगा।
  4. भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन ने सामाजिक जवाबेदही जिम्मेवारी के तहत मंदिर में स्वछता बनाये रखने में मंदिर प्रशासन का सहयोग किया है।
  5. मंदिर परिसर में सफाई बनाए रखने के लिए 63 कॉम्पैक्ट डिब्बे, 4 कम्पेक्टर ट्रक्स, 25 ई-शौचालय, 15 पानी एटीएम, 2 सड़क सफाई बैटरी संचालित वाहनों का इस्तेमाल किया गया है।

जानें मीनाक्षी सुन्दरेश्वरर मन्दिर या मीनाक्षी अम्मां मन्दिर के बारे में….

मीनाक्षी सुन्दरेश्वरर मन्दिर या मीनाक्षी अम्मां मन्दिर या केवल मीनाक्षी मन्दिर (तमिल: மீனாக்ஷி அம்மன் கோவில்) भारत के तमिल नाडु राज्य के मदुरई नगर, में स्थित एक ऐतिहासिक मन्दिर है। यह हिन्दू देवता शिव (“‘सुन्दरेश्वरर”’ या सुन्दर ईश्वर के रूप में) एवं उनकी भार्या देवी पार्वती (मीनाक्षी या मछली के आकार की आंख वाली देवी के रूप में) दोनो को समर्पित है। यह ध्यान योग्य है कि मछली पांड्य राजाओं को राजचिह्न है। यह मन्दिर तमिल भाषा के गृहस्थान 2500 वर्ष पुराने मदुरई नगर, की जीवनरेखा है।

हिंदू पौराणिक कथानुसार भगवान शिव सुन्दरेश्वरर रूप में अपने गणों के साथ पांड्य राजा मलयध्वज की पुत्री राजकुमारी मीनाक्षी से विवाह रचाने मदुरई नगर में आये थे। मीनाक्षी को देवी पार्वती का अवतार माना जाता है। इस मन्दिर को देवी पार्वती के सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। अन्य स्थानों में कांचीपुरम का कामाक्षी मन्दिर, तिरुवनैकवल का अकिलन्देश्वरी मन्दिर एवं वाराणसी का विशालाक्षी मन्दिर प्रमुख हैं। इस मन्दिर का स्थापत्य एवं वास्तु आश्चर्यचकित कर देने वाला है, जिस कारण यह आधुनिक विश्व के सात आश्चर्यों की सूची में प्रथम स्थान पर स्थित है, एवं इसका कारण इसका विस्मयकारक स्थापत्य ही है।इस इमारत समूह में 12 भव्य गोपुरम हैं, जो अतीव विस्तृत रूप से शिल्पित हैं। इन पर बडी़ महीनता एवं कुशलतापूर्वक रंग एवं चित्रकारी की गई है, जो देखते ही बनती है। यह मन्दिर तमिल लोगों का एक अति महत्वपूर्ण द्योतक है एवं इसका वर्णन तमिल साहित्य में पुरातन काल से ही होता रहा है। हालांकि वर्तमान निर्माण आरम्भिक सत्रहवीं शताब्दी का बताया जाता है।

मंदिर की ख़ासियतें

पोत्रमारै सरोवर

कह्ते हे की इन्द्र ने स्वर्ण कमल यही से तोदे थे। पोत्रमरै कूलम, पवित्र सरोवर 165 फ़ीट लम्बा एवं 120 फ़ीट चौड़ा है।यह मन्दिर के भीतर भक्तों हेतु अति पवित्र स्थल है। भक्तगण मन्दिर में प्रवेश से पूर्व इसकी परिक्रमा करते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है “स्वर्ण कमल वाला सरोवर” और अक्षरशः इसमें होने वाले कमलों का वर्ण भी सुवर्ण ही है। एक पौराणिक कथानुसार, भगवान शिव ने एक सारस पक्षी को यह वरदान दिया था, कि इस सरोवर में कभी भी कोई मछली या अन्य जलचर पैदा होंगे और ऐसा ही है भी। तमिल धारणा अनुसार, यह नए साहित्य को परखने का उत्तम स्थल है। अतएव लेखक यहां अपने साहित्य कार्य रखते हैं, एवं निम्न कोटि के कार्य इसमें डूब जाते हैं, एवं उच्च श्रेणी का साहित्य इसमें तैरता है, डूबता नहीं।

सहस्र स्तंभ मण्डप

आयिराम काल मण्डप या सहस्र स्तंभ मण्डप या हजा़खम्भों वाला मण्डप, अत्योच्च शिल्प महत्व का है। इसमें 985 (ना कि 1000) भव्य तराशे हुए स्तम्भ हैं। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुरक्षण में है। ऐसी धारणा है, कि इसका निर्माण आर्य नाथ मुदलियार ने कराया था। मुदलियार की अश्वारोही मूर्ति मण्डप को जाती सीड़ियों के बगल में स्थित है। प्रत्येक स्तंभ पर शिल्पकारी की हुई है, जो द्रविड़ शिल्पकारी का बेहतरीन नमूना है। इस मण्डप में मन्दिर का कला संग्रहालय भी स्थित है। इसमें मूर्तियाँ, चित्र, छायाचित्र एवं वित्रकारी, इत्यादि के द्वारा इसका 1200 वर्ष का इतिहास देख सकते हैं। इस मण्डप के बाहर ही पश्चिम की ओर संगीतमय स्तंभ स्थित हैं। इनमें प्रत्येक स्तंभ थाप देने पर भिन्न स्वर निकालता है। स्तंभ मण्डप के दक्षिण में कल्याण मण्डप स्थित है, जहां प्रतिवर्ष मध्य अप्रैल में चैत्र मास में चितिरइ उत्सव मनाया जाता है। इसमें शिवपार्वती विवाह का आयोजन होता है।

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मंदिर के उत्सव एवं त्यौहार

उत्सव एवं त्यौहार

इस मन्दिर से जुड़ा़ सबसे महत्वपूर्ण उत्सव है मीनाक्षी तिरुकल्याणम, जिसका आयोजन चैत्र मास (अप्रैल के मध्य) में होता है। इस उत्सव के साथ ही तमिल नाडु के अधिकांश मन्दिरों में वार्षिक उत्सवों का आयोजन भी होता है। इसमें अनेक अंक होते हैं जैसे कि रथयात्रा (तेर तिरुविझाह) एवं नौका उत्सव (तेप्पा तिरुविझाह)। इसके अलावा अन्य हिंदू उत्सव जैसे नवरात्रि एवं शिवरात्रि भी यहाँ धूम धाम से मनाये जाते हैं। तमिलनाडु के सभी शक्ति मन्दिरों की भांति ही, तमिल महीने आदि (जुलाई 15अगस्त 17) और तै (जनवरी 15 से फ़रवरी 15) में आने वाले सभी शुक्रवार बडे़ हर्षोल्लस के साथ मनाए जाते हैं। मन्दिरों में खूब भीड़ होती है।

 

 

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