सावधान हो जाए मानसिक बीमारियों के प्रति

0
250
mental health
मानसिक रोगों को लेकर हो जाए सचेत

इस भागदौड भरी जिन्दगीं में तनावग्रस्त होना कोई आम बात नहीं है, हर कोई जिन्दगीं की रेस में आगे निकलना चाहता है फिर चाहे वो बच्चे, बड़े और युवा हो हर कोई कहीं ना कहीं तनावग्रस्त रहता है बच्चों पर पढ़ाई का बोझ, बड़ों पर घर और बाहर की जिम्मेदारी और युवाओं को भविष्य की चिन्ता, सब अपनी उलझनों में उलझे रहते हैं और कब मानसिक बीमारी का शिकार बन जाते हैं पता ही नहीं चलता है।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का मानना है कि देश में मानसिक रोगों को लेकर अभी भी लोग जागरुक नहीं है, कहीं ना कहीं लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते हैं, देशभर में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत की सामान्य जनसंख्या का लगभग 13.7 प्रतिशत हिस्सा मानसिक बीमारियों से ग्रस्त है, इसके अलावा, इनमें से लगभग 10.6 प्रतिशत लोगों को तत्काल चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है।

वाकई में यह चौकाने वाली बात है कि इतने लोग मानसिक बीमरियों का शिकार हैं और उन्हें ठीक से पता ही नहीं चलता है, लेकिन कहीं ना कहीं उनके व्यवहार में काफी बदलाव आने लगते हैं, यही बदलाव जब ज्यादा बढ़ जाते हैं तो इनका गंभीर परिणाम होता है, ऐसा ही एक मानसिक विकार है सिजोफ्रेनिया, जो एक पुराना और गंभीर मानसिक विकार है और जिसकी वजह से व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और व्यवहार करने का तरीका प्रभावित होता है।

हालिकीं मानसिक बीमारी से बचने के लिए जागरुकता कार्यक्रम चलाये गये, इसी कड़ी में भारत में पहले एक राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरु किया गया था लेकिन इस कार्यक्रम को लेकर कोई खास सफलता नहीं मिली, इसकी वजह लोगों का मानसिक बीमारियों की प्रति जागरुक ना रहना है।

सिजोफ्रेनिया के संबध में आईएमए के अध्यक्ष डॉ. के.के. अग्रवाल के अनुसार सिजोफ्रेनिया 16 से 30 साल की आयु में हो सकता है, पुरुषों में इस रोग के लक्षण महिलाओं की तुलना में कम उम्र में दिखने शुरू हो सकते हैं। डॉ. अग्रवाल ने कहा कि कभी-कभी, सिजोफ्रेनिया वाले मरीजों को अन्य दिक्कतें भी हो सकती हैं जैसे कि किसी मादक पदार्थ की लत, तनाव, जुनून और अवसाद शोधर्ताओं की माने तो इस स्थिति के लिए भ्रूणावस्था में रोनल विकास भी जिम्मेदार हो सकता है।

बहुत से लोगों को इस बात का अहसास ही नहीं होता कि उन्हें यह रोग हो गया है, क्योंकि इसके लक्षण बहुत लंबे समय बाद सामने आते हैं और ऐसे लोगों के व्यवहार में काफी बदलाव आते हैं और वह दूसरों से दूर रहने लगते हैं, उनकी सोच अलग ही तरह की हो जाती है वह हर बात पर संदेह करते हैं, किसी पर जल्दी भरोसा नहीं कर पाते खासतौर से अपने सगे-संबधियों के पर, युवाओं में ऐसी स्थिति को प्रोड्रोमल पीरियड कहा जाता है, ध्यान देने वाली बात यह है कि आजकल की भागदौड भरी जिन्दगीं में यदि हमारे परिवार का सदस्य ही इस बीमारी से ग्रस्त है तो रोग का पता लगाना मुश्किल हो जाता है, क्योंकि रोगी स्वंय ही नहीं समझ पाता कि उसे हुआ क्या है और आजकल किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह एक-दूसरे के साथ कुछ पल बिता सकें।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी व्यक्ति में इस तरह के लक्षण दिखाई दें तो वह तुरुन्त किसी मनौवैज्ञानिक की सलाह जरुर लें।

  • यदि आपके परिवार के किसी भी सदस्य के व्यवहार में बदलाव दिख रहे हैं तो उससे तुरन्त बात-चीत करें।
  • अपनी बिजी लाइफ से कुछ समय निकाल कर उसके साथ बितायें ।

उसके मन की बात जानने की कोशिश करें कि किस बात से वह तनाव ग्रस्त है, उसको अपने विश्वास में लें।

मानसिक बीमरियों को लेकर अब जरुरत है जागरुक होने की, क्योंकि इस तरह की बीमरियों का शिकार बच्चें भी हो रहे हैं जरुरी है कि इस पर हम पूरा ध्यान दें बिजी लाइफस्टाइल से थोडा समय निकाल कर योगा, मेडिटेशन, नियमित रुप से घूमना आपको मानसिक रोगों से बचाने में मदद करेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here