क्या यही है हमारें देश का भविष्य ?

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education in india
भारत में शिक्षा

The World Development Report 2018 (WDR 2018)—LEARNING to Realize Education’s Promise. यह यू.एन.ओ की पहली बार पूरी तरह से शिक्षा के लिए समर्पित रिपोर्ट है।

पर भारत के लिए यह रिपोर्ट कोई खुशखबरी लेकर नही आई है, बल्कि इस रिपोर्ट में जो तथ्य दिए गये है वो एक बार फिर हमें सोचने को मजबूर कर रहे है कि क्या यही हमारें भारत का भविष्य है?

रिपोर्ट में कहा गया है कि: मानव कल्याण के लिए शिक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन यह तेजी से आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के समय में बहुत अधिक है। भविष्य के लिए बच्चों और युवाओं को लैस करने का सबसे अच्छा तरीका है केंद्र में अपनी पढ़ाई करना। 2018 WDR चार मुख्य विषयों की व्याख्या करता है:

1) शिक्षा का वादा;

2) सीखने पर प्रकाश को चमकने की आवश्यकता;

3) स्कूलों को शिक्षार्थियों के लिए कैसे काम करना है; और

4) सिस्टम को सीखने के लिए कैसे काम करना है।

  • विश्व बैंक की एक नई रिपोर्ट भारत में शिक्षा के स्तर पर गंभीर सवाल उठाती है। ‘वर्ल्ड डिवेलपमेंट रिपोर्ट 2018’ में भारत उन 12 देशों की लिस्ट में दूसरे नंबर पर है जहां दूसरी कक्षा का कोई स्टूडेंट एक छोटे से वाक्य का एक शब्द भी नहीं पढ़ पाता।
  • इस श्रेणी में भारत से ऊपर केवल मलावी है। इसके अलावा भारत उन सात देशों की लिस्ट में पहले स्थान पर है जहां दूसरी कक्षा के छात्र दहाई के अंकों का घटा भी नहीं जानते।
  • रिपोर्ट में विश्व बैंक ने कहा है, ‘ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के तीन-चौथाई छात्र दहाई के अंकों का घटा (जैसे 46 में से 17 घटाना) नहीं कर पाते, और कक्षा पांच के आधे स्टूडेंट ऐसा नहीं कर पाते।’
  • रिपोर्ट के मुताबिक़ 2010 में आंध्र प्रदेश के एक स्कूल में पांचवीं कक्षा के छात्र पहली कक्षा के एक सवाल का सही जवाब नहीं दे पाए।
  • रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि स्कूल में सालों बिताने के बाद भी लाखों बच्चों को पढ़ना-लिखना नहीं आता और वे मूल गणित तक नहीं जानते. इसमें लिखा है, ‘सीखने का संकट सामाजिक खाइयों को कम करने के बजाय उन्हें बढ़ा रहा है।
  • रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2016 में ग्रामीण भारत में पांचवीं कक्षा के बच्चे अपनी स्थानीय भाषा की दूसरी कक्षा के पाठों के वाक्य भी बिना रुके नहीं पढ़ सकते।
  • विश्व बैंक का कहना है कि बिना कुछ सीखे स्कूली शिक्षा न सिर्फ़ व्यर्थ है, बल्कि यह दुनियाभर के बच्चों के साथ अन्याय भी है।
  • रिपोर्ट में उसने कहा है कि इन देशों में लाखों छात्र मौक़े तलाशते रहते हैं और बाद में कम आय में जीवन बिताते हैं. ऐसा इसलिए कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा उन्हें जीवन में सफल होने की शिक्षा देने में असफल हो रही है।
  • अच्छी तरह से मिली शिक्षा युवाओं को रोज़गार, बेहतर आय, अच्छा स्वास्थ्य और बिना ग़रीबी का जीवन देती है.’ रिपोर्ट में लिखा है कि ग़रीबी, संघर्ष, लिंग या अक्षमता की वजह से पहले वंचित स्टूडेंट सबसे ज़रूरी मूल योग्यताओं के बिना ही युवा हो जाते हैं।
  • बैंक ने इन विकासशील देशों के इस संकट को दूर करने के लिए एक मज़बूत नीति बनाए जाने की सिफ़ारिश की गई है।

जानें यह भी 

निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक, २००९

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निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक, २००९

निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक, २००९ भारतीय संसद द्वारा सन् २००९ में पारित शिक्षा सम्बन्धी एक विधेयक है। इस विधेयक के पास होने से बच्चों को मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा का मौलिक अधिकार मिल गया है। संविधान के अनुच्छेद 45 में 6से 14 बर्ष तक के बच्चों के लिये अनिवार्य एवं नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की गयी है तथा 86 वें संशोधन द्वारा 21 (क) में प्राथमिक शिक्षा को सब नागरिको का मूलाधिकार बना दिया गया है। यह 1 अप्रैल 2010 को जम्मू -कश्मीर को छोड़कर सम्पूर्ण भारत में लागु हुआ।

6 से 14 साल के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी

  • निजी स्कूलों को 6 से 14 साल तक के 25 प्रतिशत गरीब बच्चे मुफ्त पढ़ाने होंगे। इन बच्चों से फीस वसूलने पर दस गुना जुर्माना होगा। शर्त नहीं मानने पर मान्यता रद्द हो सकती है। मान्यता निरस्त होने पर स्कूल चलाया तो एक लाख और इसके बाद रोजाना 10 हजार जुर्माना लगाया जायेगा।
  • विकलांग बच्चों के लिए मुफ़्त शिक्षा के लिए उम्र बढ़ाकर 18 साल रखी गई है।
  • बच्चों को मुफ़्त शिक्षा मुहैया कराना राज्य और केंद्र सरकार की ज़िम्मेदारी होगी।
  • इस विधेयक में दस अहम लक्ष्यों को पूरा करने की बात कही गई है। इसमें मुफ़्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने, शिक्षा मुहैया कराने का दायित्व राज्य सरकार पर होने, स्कूल पाठ्यक्रम देश के संविधान की दिशानिर्देशों के अनुरूप और सामाजिक ज़िम्मेदारी पर केंद्रित होने और एडमिशन प्रक्रिया में लालफ़ीताशाही कम करना शामिल है।
  • प्रवेश के समय कई स्कूल केपिटेशन फ़ीस की मांग करते हैं और बच्चों और माता-पिता को इंटरव्यू की प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है। एडमिशन की इस प्रक्रिया को बदलने का वादा भी इस विधेयक में किया गया है। बच्चों की स्क्रीनिंग और अभिभावकों की परीक्षा लेने पर 25 हजार का जुर्माना। दोहराने पर जुर्माना 50 हजार।
  • शिक्षक ट्यूशन नहीं पढ़ाएंगे।

 

 

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