टॉम ऑल्टर, एक महान अभिनेता जिन्होने खुद को हमेशा हिन्दुस्तानी माना

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टॉम ऑल्टर की हिंदी, उर्दू और अंग्रज़ी में मज़बूत पकड़ थी

टॉम ऑल्टर उन चंद अभिनेताओं में शामिल हैं जो अंग्रेज़ जैसे दिखने के बावजूद भारतीय सिनेमा में अपनी ख़ास जगह बनाने में सफल रहे। उनकी उर्दू और हिन्दी सुनकर तो हर कोई हैरान ही हो जाता था। 29 सितंबर, 2017 को 67 साल की उम्र में इनका निधन हो गया। वह स्किन कैंसर की लास्ट स्टेज पर थे।

एक फ़िल्म ने उनके अंदर कैसे इतना उत्साह भरा की वो इसी क्षेत्र में सफलता हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध हो गए? आज उनके ज़िंदगी के ऐसे ही अनछुए पहलुओं को हम आपसे रूबरू कराएँगे।

भारत पाकिस्तान के बँटवारे का असर टॉम पर भी हुआ-

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टॉम उतने ही भारतीय थे, जितने की हम

आज़ादी के बाद टॉम के दादा-दादी पाकिस्तान में रहे जबकि माता-पिता हिंदुस्तान में ही रहे। पिता परिवार समेत सबसे पहले इलाहाबाद रहे, फिर सहारनपुर, फिर जबलपुर और आख़िर में देहरादून और मसूरी के बीच स्थित राजपुर से उन्होने स्कूलिंग की। टॉम ने 1954 से 1968 तक का समय राजपुर और मसूरी में बिताया।

टॉम ऑल्टर का जन्म 22 जून 1950 को मसूरी में हुआ था। अमेरिकी मूल के टॉम के दादा- दादी साल 1916 में अमेरिका के ओहियो से मद्रास (अब चेन्नई) आ गए थे।

19 साल की उम्र में बिना ट्रेनिंग के टीचर बन गए-

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कई साल तक उन्हने नौकरियां की

टॉम कॉलेज के लिए अमेरिका की येल यूनीवर्सिटी गए थे लेकिन एक साल में वापस भारत आ गए। यहाँ, हरियाणा के सेंट थॉमस स्कूल में 19 साल की उम्र में टीचर बन गए और कुछ दिन काम किया। फिर वापस अमेरिका गए, वहां उन्होने अस्पताल में काम किया। फिर चाचा के बुलावे पर कई साल तक ऐसे ही नौकरियां की।

अभिनेता ही नही एक खेल पत्रकार भी थे-

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ऑल्टर पहले पत्रकार थे जिन्होंने सचिन तेंदुलकर का इंटरव्यू लिया था

एक्टिंग में आने से पहले ऑल्टर खेल पत्रकार थे। ऑल्टर पहले ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने सचिन तेंदुलकर का इंटरव्यू लिया था। टॉम ने 1970 में जगाधरी में राजेश खन्ना की फ़िल्म ‘आराधना’ देखी। इस फ़िल्म का उनपर बहुत असर हुआ। टॉम को उसी वक़्त एक्टर बनने का ख़याल आया और उन्होने इस क्षेत्र में मुकाम बनाने की ठान ली।

उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया-

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उनकी जबरदस्त एक्टिंग को देखते हुए, उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया

70 के शुरुआती दौर में भारत लौट आए। 1972 में वह उन तीन लोगों में शामिल थे, जिनको पुणे स्थित देश के प्रतिष्ठित फिल्म ऐंड टेलिविजिन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया में दाखिले के लिए उत्तरी भारत के 800 आवेदकों में से चुना गया था।

उनकी जबरदस्त एक्टिंग को देखते हुए इस दौरान उन्हें गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया।

उन्होंने साल 1976 में रिलीज हुई फिल्म की ‘चरस’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया, इस फिल्म में मशहूर अभिनेता धर्मेंद्र भी थे। 300 फिल्मों में काम कर चुके ऑल्टर ने 1990 में टीवी शो ‘जुनून’ में केशव कालसी का किरदार निभाया था।

पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़े गए-

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पद्मश्री अवॉर्ड से सम्मानित बॉलीवुड एक्टर टॉम ऑल्टर

टॉम ऑल्टर ने तीन किताबें भी लिखीं, जिसमें एक नॉन फिक्शन और दो फिक्शन किताबें शामिल हैं।
कला और फिल्म जगत में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए साल 2008 में उन्हें भारत सरकार की ओर से पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा जा चुका है।

भीमताल से बेहद लगाव था टॉम ऑल्टर को-

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टॉम ऑल्टर को अंग्रेजी ही नहीं, हिंदी, उर्दू और गढ़वाली भी थी पसंद

यहाँ आने और पहाड़ भ्रमण के दौरान लोगों से ठेठ गढ़वाली बोली में मुखातिब होते थे। उन्हे यहाँ का नज़ारा और संस्कृति से बेहद लगाव था। उन्हे पहाड़ों की सैर करना बेहद पसंद था।

टॉम ऑल्टर को अंग्रेजी ही नहीं, हिंदी, उर्दू और गढ़वाली भी थी पसंद-

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लोग टॉम की गढ़वाली सुनने के लिए गुज़ारिश किया करते थे।

टॉम की गढ़वाली सुनने के लिए लोग बेताब रहते थे। टॉम के दोस्त रहे गोपाल भारद्वाज बताते हैं, टॉम अंग्रेजी बोलने वालों से परहेज करते थे।
मसूरी आने पर वह गांवों में कई दिन रहकर वह यहां की लोक संस्कृति से रूबरू होते। टॉम चेहरे से तो विदेशी लगते थे, मगर बोली-भाषा से पहाड़ी। यही कारण था कि लोग टॉम की गढ़वाली सुनने के लिए गुज़ारिश किया करते थे।

इतना ही नहीं उर्दू भाषा में भी उनकी पकड़ अच्छी थी। कई बार वह अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट उर्दू भाषा में लिख कर लाने को कहते थे

उनकी सदाबहार फिल्में-

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आज भी लोग और फिल्मी दुनिया उन्हे याद करती है

फिल्म शतरंज के खिलाड़ी, आशिकी, क्रांति और परिंदा ऐसी फिल्में हैं, जिनमें न केवल टॉम के काम को बेहद सराहा गया बल्कि ये फिल्में आज भी सिनेमा प्रेमियों के बीच चर्चा में रहती हैं।

आज भी लोग और फिल्मी दुनिया उन्हे याद करती है। कई बार वह कहते थे कि वो तो हिन्दुस्तानी ही हैं। हिन्दुस्तान के लिए उनका प्रेम किसी भारत वासी से कम नहीं था।

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