क्या मीट खाने से तबाह हो रहे हैं हिमालय और कॉन्गो जैसे क्षेत्र?

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पर्यावरण बचाएं

ये सोचनें वाली बात ही है कि आज वैश्विक रूप में पर्यावरण को बचानें के भरपूर प्रयास कियें जा रहें है उसके बावजूद भी आये दिन हम ऐसी ऐसी ख़बरों से रूबरू हो रहें है कि जो आश्चर्यजनक हैं। हाल ही में वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (WWF) ने अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है जिसमें कहा गया है कि इंसानी आबादियों के मीट खाने की वजह से हिमालय और कॉन्गो जैसे क्षेत्र तबाह हों रहें है।

WWF REPORT
वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड
  • वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (WWF) द्वारा एक चौंकाने वाली रिपोर्ट दी गई है जिसमें दावा किया गया है कि मीट खाने वालों की वजह से हिमालय और कांगो तबाह हो रहे हैं। WWF का कहना है कि मीट खाने वाले लगातार बढ़ रहे हैं और इस वजह से ज्यादा जानवर चाहिए, ज्यादा जानवर होंगे तो उनके लिए ज्यादा चारा भी पैदा करना होगा, ज्यादा चारे के लिए ज्यादा जगह की भी जरूरत होगी।
  • इस वजह से अमेजन, कांगो और हिमालय के इलाके इस वजह से ही तबाह हो रहे हैं। बता दें कि कांगो अपने जंगलों और हिमालय अपने पहाड़ों के लिए मशहूर है।
  • लगातार मीट के बढ़ते उपभोग की वजह से अब दुनिया के यें जंगल और पहाड़ ख़त्म होनें की कगार पर पहुँच गयें है।
  • वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड (WWF) के मुताबिक, पश्चिमी देशों के भोजन का प्रचलन बढ़ने से, जिसमें बड़ी मात्रा में मांस और डेयरी उत्पाद शामिल हैं, के लिए यूरोपियन यूनियन के आकार से भी डेढ़ गुना बड़े इलाके को चारागाह बनाने की जरूरत है। वह भी तब जब पशु उत्पादों के वैश्विक उपभोग को सिर्फ पोषण संबंधी जरूरतों तक सीमित कर दिया जाए।
  • ‘ऐपिटाइट फॉर डिस्ट्रक्शन’ नाम की नई रिपोर्ट के मुताबिक पशु उत्पादों के उपभोग के बढ़ने से अब बड़ी मात्रा में भूमि का इस्तेमाल फसल के लिए किया जा रहा है। इससे ऐमजॉन, कॉन्गो बेसिन और हिमालय जैसे इलाको को भी खतरा बढ़ गया है, जहां जल और अन्य संसाधन पहले से ही बहुत ज्यादा दबाव झेल रहे हैं।
  • WWF की रिपोर्ट के मुताबिक, पशु उत्पादों का बहुत ज्यादा उपभोग धरती पर जैव विविधता में 60 प्रतिशत गिरावट का जिम्मेदार है। दुनिया भर में लोग जरूरत से ज्याद पशुओं से मिलने वाला प्रोटीन ले रहे हैं और इसका वन्यजीवन पर विनाशकारी असर पड़ रहा है।
  • मांस आधारित भोजन का जल और भूमि पर असर पड़ता है और यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की वजह भी बनता है लेकिन कुछ ही लोगों को इन पशुओं को चारा मुहैया करवाने के लिए फसल उगाने की जमीन की जरूरत की वजह से पड़ने वाले बड़े प्रभावों के बार में पता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2010 तक सोया का उत्पादन इतनी बड़ी मात्रा में होता था कि ब्रिटिश लाइवस्टॉक (पशु) इंडस्ट्री को यॉर्कशर शहर जितने बड़े क्षेत्र में पशुओं को खिलाने के लिए सोया उत्पादन करने की जरूरत थी। मीट के उपभोग बढ़ने की वजह से सोया का उत्पादन भी साल 2050 तक 80 फीसदी बढ़ने की उम्मीद है।

जानें वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड (WWF)

वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) 1961 में स्थापित एक अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन है, जो प्राकृतिक संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहा है, और पर्यावरण पर मानवी प्रभाव का आकलन करता  है। इसे पहले में विश्व वन्यजीव निधि के नाम से जाना जाता था, जो कि आज भी कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका में इसका आधिकारिक नाम है। लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट को डब्ल्यूडब्ल्यूएफ द्वारा 1998 से हर दो साल में प्रकाशित किया जाता है। यह एक लिविंग प्लैनेट सूचकांक और इकोलॉजिकल फुटप्रिंट की गणना पर आधारित है।

 world wild life fund
वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ फंड

यह दुनिया का सबसे बड़ा संरक्षण संगठन है जो विश्वभर में 50 लाख से अधिक समर्थकों के साथ काम करता है एवं 100 से अधिक देशों में काम कर रहा है और लगभग 1300 पर्यावरण संरक्षण की परियोजनाओं का समर्थन करता है। डब्लूडब्लूएफ की नींव  कई व्यक्तियों और संस्थओं द्वारा रखी गई। जिसमें से धन का 55% हिस्सा सरकारी स्रोतों (जैसे विश्व बैंक, डीएफआईडी, यूएसएआईडी) से आता है और 19% हिस्सा निगमों से बाक़ी का 8% व्यक्तिगत हिस्सेदारी है।

इस समूह का मिशन “इस ग्रह के प्राकृतिक पर्यावरण के क्षरण को रोकने के लिए और एक ऐसे भविष्य का निर्माण करने के लिए है जिसमें मनुष्य प्रकृति के अनुरूप रहता हों।” वर्तमान में, इसके बहुत सारे काम उन तीन बायोमों के संरक्षण पर केंद्रित हैं जिनमें महासागर और तट, जंगलों और मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र सम्मिलित है। यही अधिकांश दुनिया की जैव विविधता: को बनाएं रखते है। इनकें अन्य कार्यों में,लुप्तप्राय प्रजातियों का संरक्षण, वस्तुओं के टिकाऊ उत्पादन और जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित मुद्दों का चिंतन भी शामिल है।

 

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